मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

अकेलापन ...!

महान अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मास्लो ने एक पिरामिड बनाया जिसको उन्होंने
पहला Self Actualization
दूसरा Esteem needs
तीसरा Social needs
चौथा Safty needs
और पाँचवा Physiological needs
इनको पाँच भागों में बाँटते हुए कहा कि मनुष्य हमेशा नीचे से ऊपर एक चीज़ पाने के बाद दूसरी चीज़ पाने के लियें प्रयत्नशील रहता है और यह तब तक चलता है जब तक उसे संपूर्णता का अहसास नहीं होता ! हम देखते है मनुष्य का जीवन इन पाँच ज़रूरतों के आसपास ही घूमता हुआ !
अकेलापन,रिक्तता,अपूर्णता ये कुछ ऐसे नकारात्मक शब्द है जो मनुष्य के जीवन में भौतिक ज़रूरतों की कमी,सुरक्षा की कमी,आत्मीय रिश्तों की या प्रेम की कमी,आत्मसम्मान की कमी,आत्मसिद्धि या बुद्धत्व की किसी न किसी कमी को दर्शाते है !

क्रमश ....

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

सद्‌गुण

सद्‌गुण एक ऐसा
उत्तम गुण है
जिसे सिखने की
ना ही नक़ल करने की
ज़रूरत पड़ती है !
सद्‌गुण उस ख़ूबसूरत
गुलाब के फूल की
तरह होता है जो
अपनी बंद पंखुड़ियों को
बडे शान से इस
अस्तित्व में खोलता
है !

सोमवार, 20 अगस्त 2018

निर्भार ..

फूल खिलते ही 
सुगंध बहाकर 
ले जा रही थी हवा 
फूल ने मुस्कुराकर कहा ...
आभार,
गंध से मुझे जो
कर दिया निर्भार … !

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सुहाना मौसम है !

ऊंघ रहे क्यों मन
मछुआरे ?
चलो नदी तट पर चले
सुहाना मौसम है !

खूबसूरत शब्दों का
आकर्षक जाल बुने
भावनाओं के आटे से
बनी गोलियां
सुनहरी मछलियों को
खिलायें !


छपाक से डालकर
पानी में जाल
खूब सारी मछलियों को
फंसाये !
चलो नदी तट पर चले
सुहाना मौसम है !


बुधवार, 29 मार्च 2017

कुछ विचार ऐसे भी होते है ...

विचारों की भी अपनी
उम्र होती है !
कुछ विचार जन्म
लेते ही सिकुड़ने
लगते है देर सवेर
मरने के लिए !
कुछ तो जन्म लेने से
पहले गर्भ में ही मर
जाते है !
कभी-कभार कुछ
किसी ब्लॉटिंग पेपर पर
गिरी स्याही के समान
फैलकर देश,समय,
सीमाओं के पार
कालजयी हो जाते है ... !

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

मन एक "प्रिज्म" है !

आत्मा की 
किरणे श्वेत रंग की
जब तिमिर आवरण 
को चीरकर 
मन नाम के
प्रिज्म से टकराती है 
तब यह 
ब्लैक एण्ड व्हाईट दुनिया 
इंद्रधनुषी दिखाई देने 
लगती है  !
खूबसूरत खयाली 
घूँघट की ओट में 
छिप जाती है प्रकृति 
सुंदरता अवर्णनीय 
है जिसकी  !

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

मुझे लगा भावना कोई और चीज होनी चाहिए !

लोग जिस तरह से अपने प्रिय नेता के मरने पर छाती पीट-पीट कर रोते हुए उन्मादी भावनायें व्यक्त करते है,पूरी दुनिया के लिए यह एक जिज्ञासा का विषय है ! ऐसे में मुझे शाही परिवार में जन्मे लियो टाल्सटाय जो एक बेहतरीन लेखक भी थे का लिखा यह संस्मरण आप सबसे साझा करने का मन हुआ ! भावना व्यक्त करने का यह भी एक नमूना देखिये !

उन्होंने लिखा, मैं बचपन में अपने माँ के साथ थिएटर में नाटक देखने जाता था ! नाटक में जहाँ कहीं भी ट्रेजडी सीन होता मेरी माँ ऐसे धुँआधार रोती कि कभी-कभी उनके आँसुओं से चार-चार रुमाल भीग जाया करते और नौकर हमेशा रुमाल लिए खड़े रहते ! टाल्सटाय लिखते है कि मैं उनके बगल में बैठा रोते हुए अपने माँ को देखकर सोचता कि वो कितनी भावनाशील महिला है !

लेकिन जब मैं बड़ा हुआ तब मुझे असल बात का पता चला ! थिएटर जाते समय उनका आदेश था उसकी बग्घी  खड़ी रहे और कोचवान बग्घी पर ही बैठा रहे क्या पता थिएटर से कब उसका जाने का मन करे और दूसरा कोचवान समय पर न मिले ! कई बार ऐसा होता की बाहर बर्फ पड़ती रहती,जब तक वह नाटक देखते रहती,तब तक एखाद,दो कोचवान मर जाते ठंड से ! मरे हुए कोचवान को तुरंत हटाकर दूसरे कोचवान को बिठाया जाता बग्घी पर ! मेरी माँ की नजरों के सामने यह सब होता लेकिन वह निर्विकार कुछ न कहती कोई भाव न दिखते मुझे उनके चेहरे पर ! नाटक में ट्रेजडी सीन देख कर रोने वाली माँ असल जीवन में भावनाविहीन कैसे हो सकती है ? यह कैसी भावना
है ? मुझे लगा भावना कोई और चीज होनी चाहिए
या यह भावना नहीं है .. !