गुरुवार, 1 अगस्त 2013

"दो और दो पांच"

शिक्षा मन पर 
भार नहीं
अहंकार का
बोझ न हो 
चाहिए थी 
एक ऐसी ही 
पाठशाला मुझको 
खेल-खेल में 
समझाये सबको
मित्रों, 
जीवन भी एक 
खेल ही है 
कोई गोल करता है 
कोई आउट होता है 
ऐसा क्यों होता है ?
वैसा क्यों होता है ?
बेमानी सब तर्क है 
जीवन कोई गणित
है क्या ?
जिसे तर्कों से 
हल किया जा सके 
बिना प्रतिस्पर्धा के 
हार-जीत के बिना 
जीवन एक खेल 
है खिलाडियों का 
जिसमे दो और दो 
चार नहीं 
भी होते है   …

शनिवार, 27 जुलाई 2013

मुझे गर्व है अपनी इन होनहार बेटियों पर ...


भारत के कुछ प्रसिद्ध शास्‍त्रीय नृत्यों में भरतनाट्यम एक नृत्य है इसके बारे में जानकारी आप सब जानते ही है ! अलग से कहने की कोई आवश्यकता नहीं है, प्रत्‍येक नृत्य का संबंध देश के विभिन्‍न प्रदेशों से है लेकिन इन की जड़े कही गहरे तक हमारे भारत की प्राचीन परंपराओं से जुडी है !

हमारे देश के बाहर भी इन परंपराओं का योग्य प्रचार प्रसार होता देख कर मन को संतोष होता है ! और हमारी उन्नत प्राचीन संस्कृति के प्रति गर्व होता है, ऐसी ही एक संस्था अमेरिका के अटलांटा में है जिसका नाम है Kruti Dance Academy इस संस्था की संचालिका है जानी मानी नृत्यांगना  Mrs.Dina Sheth, she is the founder and director of Kruti Dance Academy, Atlanta’s most renowned and prestigious Indian Dance institution. She has been teaching Indian classical, folk and contemporary dance for over 25 years. Under her guidance 74 students have completed Arangetram the pinnacle exhibition of the mastery of Bharatanatyam.

इस नृत्यांगना के पास बचपन से भरतनाट्यम सिख रही उनकी प्यारी शिष्यायें कुमारी विदिशा और विशाखा है जो की मेरी बहन विद्या विनायक होलसंबरे की बेटियाँ है ! वहां के Roswell Cultural Arts Center में इन दोनों बच्चियों का  August 3rd को Arengetram है !

आज ही आया है निमंत्रण , विद्या ने मुझे बहुत ही प्यार से प्यारा सा  इनविटेशन कार्ड भेज दिया है अमेरिका आने के लिए ! विद्या मेरी सबसे प्यारी छोटी बहन ही नहीं मेरी दोस्त सब कुछ है ! मै इस उत्सव पर जाऊं या न जाऊं क्या फर्क पड़ता है लेकिन सदैव मेरी हार्दिक शुभकामनायें उसके साथ,उसके परिवार के साथ है और हमेशा रहेंगी ! आप सबसे भी यह खुश खबरी साझा करना चाहती हूँ और हमारी शास्त्रीय नृत्य परंपराओं को विदेश में भी प्रसार कर रही इन प्यारी बेटियों के लिए आप सबसे आशीर्वाद चाहती हूँ ! मुझे गर्व है अपनी इन होनहार बेटियों पर जो अपने माता-पिता का नाम ही नहीं बल्कि विदेश में रहकर नृत्य कला से अपने देश का नाम भी ऊँचा कर 
रही है ! 

रविवार, 21 जुलाई 2013

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ....

हमारे शास्त्रों में गुरु का विशेष महत्व बताया गया है ! माता-पिता, शिक्षक, मित्र यह सब हमें पूज्यनीय और गुरु समान है इनके सहाय्यता के बिना हम आज कुछ भी नहीं होते ! हमारे व्यक्तित्व निर्माण में इन सबकी महत्वपूर्ण भूमिका है ! व्यक्तित्व निर्माण में यह सब लौकिक गुरु नीव की तरह है तो अध्यात्मिक सद्गुरु शिखर के समान है !

यदि दृष्टिदोष हुआ हो तो हम क्या करते है ? जाहिर सी बात है हम किसी अच्छे नेत्र चिकित्सक के पास जाते है ! यदि दृष्टिकोण ही बदलना हो, तब तो कोई मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, तत्व चिंतक सद्गुरु ही काम आते है ! सद्गुरु ध्यान रूपी शल्य चिकित्सा पद्धति से हमारे दृष्टिकोण को न सिर्फ तराशता, निखारता है बल्कि जीवन को देखने का अंदाज ही बदल देता है ! आप के मन में यह प्रश्न आ सकता है कि, हमारे दृष्टिकोण को बदलने की क्या जरुरत है अच्छी खासी तो है ! नहीं, अच्छी खासी होती तो हम यूँ अधूरे-अधूरे न  जीते न जीवन में निराश,दुखी, तनाव में होते !

सद्गुरु उस शांत-शीतल सरिता के समान है जिसके किनारे बैठ कर, जिसे सत्संग भी कहा जाता है ... फिर से हम अपनी प्राकृतिक निर्विकार, निश्छल, चेतना को पाया जा सकता है स्वस्थ हुआ जा सकता है  जिसके बिना यह जीवन, यह सब उपलब्धिया अधूरी सी है! आईये, आज के दिन इस गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हम भी हमारे ह्रदय रूपी ज्योति कलशों में सद्गुरु की अनुकंपा भर लेते है और पोर-पोर नहा लेते है …! 

बुधवार, 17 जुलाई 2013

आखिर उनके दुकानों का सवाल जो है .....!!

यह कहानी है तो पुरानी  पर आज भी मुझे प्रासंगिक लगती है  ! हुआ यूँ की एक छोटे से गांव में एक विचारक रहता था  ! एक दिन सुबह-सुबह वह उस गांव के तेली के पास तेल खरीदने गया था  ! तेली अपने दुकान पर बैठा तेल बेच रहा था  और दुकान के पीछे ही तेली का बैल कोल्हू को चला रहा था  !विचारक ने तेली को तेल देने के लिए कहा , तभी उसने देखा कि तेली का बैल कोल्हू चला रहा है लेकिन उसे चलाने वाला कोई नहीं था बैल खुद अपने आप चल रहा था  ! विचारक को बड़ा आश्चर्य हुआ , उसने तेली से पूछा कि , "कमाल है बिना आदमी के चलाये कैसे यह बैल अपने आप चल रहा है " ऐसा आश्चर्य मै पहली बार देख रहा हूँ  ! ऐसी कौनसी तरकीब अपनाई है आपने  ? बड़ा स्वामि भक्त लगता है आपका यह बैल  ! विचारक की बात सुन कर तेली जोर से हंसते हुए कहा ..."यह बैल अपने आप स्वेच्छा से नहीं चल रहा है इसमे मेरी बढ़िया तरकीब काम कर रही है देखते नहीं हो, मैंने इसके आँखों पर पट्टी बांध रखी है  !इसलिए बैल को दिखाई नहीं देता की पीछे कोई है भी या नहीं है  ! वो यह मानकर चल रहा है कि पीछे कोई है उसे हांकने वाला "!  
विचारक ने तेली की बात सुनकर कहा ..."लेकिन बैल कभी रूककर भी तो जाँच कर सकता है कि कोई पीछे है या नहीं है , कभी जाँच नहीं करता क्या  ? बड़ा विश्वासु और श्रद्धावान लगता है यह आपका बैल  "! विचारक की बात सुनकर तेली ने कहा ....बात श्रद्धा और विश्वास की नहीं है , देखते नहीं हो , मैंने उसके गले  में घंटी बाँध रखी है इसलिए वह चलता रहता है घंटी बजते रहती है और मुझे घंटी की आवाज से पता चलता है कि बैल चल रहा है  ! जब भी बैल थककर रुकता है तो घंटी की आवाज नहीं आती तब जाकर  मै तुरंत हांक देता हूँ  बैल फिर से चलता रहता है और बैल को भी हमेशा यह ख्याल बना रहता है कि पीछे कोई है हांकने वाला , और घंटी की आवाज से मुझे पता चलता है कि बैल चल रहा है  !
लेकिन तेली की तर्कों को हमारे विचारक कहाँ मानने वाले थे , सो विचारक ने फिर से यह प्रश्न किया कि , "मान लीजिये कभी बैल एक जगह खड़ा रहकर भी तो अपनी गर्दन हिला सकता है और घंटी बजती रहती है इस प्रकार आपको धोखा भी तो दे सकता है ,तब क्या करते हो आप " !
विचारक के तर्कपूर्ण  बाते  सुनकर तेली को बड़ा गुस्सा आ गया और गुस्से से कहा ....."ओ महाशय  जल्द से जल्द  यहाँ से तशरीफ ले जाइये ....किसी दुसरे दुकान पर जाकर तेल खरीद लीजिये अगर मेरे बैल ने आपकी बाते सुन ली तो गजब हो जायेगा मेरी दुकान  बंद हो जाएगी ...इस बैल की वजह से ही तो मेरी रोजी-रोटी 
चलती है  !
मुझे यह कहानी पढ़कर ऐसा लगा कि ,सीधे साधे लोगों की आँखों पर पट्टी बांधकर गले में अंधविश्वास की घंटी  बांधकर उनका शोषण करना कितना आसान काम है न , आजकल तो यही हो रहा है ...इसी कारण तो उनकी दुकाने चल रही है , यदि कोई उस विचारक की तरह प्रश्न करे तो नास्तिक कहकर उसे भगा दिया जाता है आखिर उनके दुकानों का 
सवाल जो है .....!!



रविवार, 7 जुलाई 2013

गुलमोहर ...

मेरे कमरे की खिड़की के बाहर दिखाई देता है गुलमोहर का पेड़  ! प्रति वर्ष अप्रैल से लेकर मई महीने में अपने पुरे बहार पर होता है  !गुलमोहर की लंबी -लंबी शाखायें  आकाश में फैली हुई , लाल फूलों से भरी हरी-भरी टहनियों का अनुपम सौंदर्य देखते ही बनता है  ! साथ में गुलमोहर पर रहने इन दिनों आ जाती है कोयल, भांति-भांति की चिड़ियाँ  ! जब भी गुलमोहर हवाओं की सरसराती ताल पर झूम-झूमकर नाचता है तब मुझे ऐसा लगता है जैसे गुलमोहर इस अस्तित्व में अपने होने का उत्सव मना रहा है  ! गुलमोहर ही नहीं उसके लाल फूल भी हवाओं के साथ नाचते हुए  धरती पर झरते है ,तब निचे धरती पर लगता है किसी ने लाल फूलों का गालिचा बिछा दिया है ! कभी-कभी तो इन फूलों की पंखुड़ियाँ  मेरे कमरे के भीतर तक आ  जाती  है  ! इन पंखुड़ियों को हाथ में लेकर सोचती हूँ गुलमोहर ने मेरे लिए भेंट  स्वरूप भेजे है  ! सच में किसी ने इसका नाम भी सोच समझ कर ही रखा होगा  गुल का मतलब फूल और मोहर का मतलब मोर का पिसारा , है ना प्यारा नाम गुलमोहर  का ...!सुबह शाम चिड़ियों की चहचहा हट ,कोयल की कुहुक से गुलमोहर के आस-पास खुशहाली ही खुशहाली दिखाई देती है  ! पेड़ का स्वास्थ्य उसकी सुंदरता  उसके अदृश्य जड़ों पर निर्भर करती है  !आजकल  मेरे कमरे की खिड़की से गुलमोहर  को घंटों  निहारना  मेरी दिनचर्या -सी बन गई है  ! 
एक आत्मीय संबंध सा बन गया है उसके साथ  !

दिन के अवकाश के पश्चात रात की गहरी कालिमा ने सारे संसार को आच्छादित कर दिया है  ! गहरी नींद की आगोश में  सो रही है सारी दुनिया ,लेकिन मै अकेली जाग रही हूँ ..नींद आँखों से कोसो दूर ...पता नहीं मन आज बेचैन सा हो गया है ! खिड़की पर हाथ टिकाये दूर-दूर तक पसरे सन्नाटे को देख रही हूँ  ! अचानक कोई वाहन  गुजर गया है शायद, गुलमोहर एक बार उसकी  रौशनी  में  नहा गया था ...फिर से निशब्द  सब कुछ  ! अंधकार में पेड़ों की छायायें रेंगती  हुई -सी  अदभूत अनुभव  हुआ ...खिड़की  से आती हवाओं के शीतल झोंकों ने मन की बेचैनी  भी कुछ हद तक कम हुई थी  ! सोचने लगी  थी कि , हम मनुष्य रूपी पेड़ों की  भी जड़े होती है  जीवन की मिट्टी में फैली हुई  ! हमारे प्राण यही से पोषण ग्रहण करते है और फलते फूलते है  ! बाहर का दिखाई देने वाला सारा विस्तार इन जड़ों की वजह से है  ! मुझे ऐसा क्यों लग रहा है  कि ,कोई शैतानी ताकत है जो हमारी इन जड़ों को काट रही है  और हमें पता तक नहीं चल रहा है  और हम अपनी ही जड़ों  से दूर होते जा रहे है ...दूर बहुत दूर ...!

बुधवार, 3 जुलाई 2013

सत्य पाने के लिए सुकरात होना पड़ता है ...

सत्य इतना सस्ता नहीं 
कि, जिसे हर कोई 
बेचा ख़रीदा जा सके 
सत्य पाने के लिए 
सुकरात होना पड़ता है 
पीना पड़ता है जहर !
लेकिन,
अन्य व्यवसायों की तरह 
अध्यात्म बेचने खरीदने का 
व्यवसाय भी खूब फल-फूल 
रहा है  इन दिनों,
परमात्मा को बेचने खरीदने की 
भारी प्रतियोगिता चल रही है 
टी. वी. के धार्मिक चैनलों पर,
इन गुरुओं की चिल्ल-पो में 
सद्गुरु की अमृत वाणी भी 
नक्कार खाने की तूती बनकर 
रह गई है ...
ध्यान बेचा ख़रीदा जा रहा है 
भारी रुपयों  के ऐवज में,
रटे रटाये प्रवचन सुना 
रही है छोटी बच्चियां भी 
तोतों की तरह, और 
मजे से सुन रहे है बड़े-बुजुर्ग 
माँ-बहने लेकिन, कोई यह 
क्यों नहीं कहते कि,
बिटिया, तुम्हारी खाने-खेलने 
पढ़ने-लिखने की उमर है 
प्रवचन सुनाने की नहीं ....!!



गुरुवार, 27 जून 2013

रुपये की कहानी उसी की जुबानी ...!

रूपया कल मुझे अपनी आपबीती सुनाते-सुनाते फफक पड़ा ! मुझे उसकी दयनीय हालत पर दुःख
हुआ ! उसे प्यार से समझाते हुए कहा ...."देख भाई रोना मत बुरा वक्त हर किसी के जिंदगी में आता है आज तुम्हारा बुरा वक्त चल रहा है लेकिन कल अच्छा वक्त भी आएगा यकीन रख, तू भी क्या हम स्त्रियों की भांति रोने लगा है "?  पहले मै भी स्त्री ही था तुम्हारी तरह, सोचा था अच्छा है घर बैठकर राज करुँगी पति की कमाई पर, वो नाम मात्र के मंत्री होंगे लेकिन घर की  वित्त मंत्री तो मै ही रहुंगी बाहर के काम काज से मुझे क्या पड़ी ? पुरुष का काम पुरुष ही जाने रुमाल से अपने आंसू पोछते हुए उसने कहा ! मैंने आश्चर्य से कहा लेकिन तुम तो पुरुष हो यह सब हुआ कैसे ? एक स्त्री का दुःख स्त्री से बेहतर कौन जान सकता है भला ? इसके लिए तुझे मेरी दुःख भरी कहानी सुननी पड़ेगी बहन रुपये ने कहा ....तो सुना दो भाई मैंने उतावले स्वर में कहा !

बात बहुत साल पुरानी है तब मै अपने भाइयों के साथ एक गाँव में संपन्न किसान के घर में रह रहा था ! रोज रात पडौस के गांव में डकैती की चर्चा सुन किसान बेचारा डर जाता था ! एक दिन उसने अपने घर के भीतर वाले कोठी में, जिसमे भूसा भरा हुआ था, एक गड्ढा खोद कर मिटटी के बर्तन में मुझे मेरे भाइयों के साथ बंद कर दिया, ऊपर से मिटटी भूसा डाल दिया ! वहां न प्रकाश न स्वतंत्रता, अजीब जेलखाने में बंद कर दिया था उसने, विवश भरे जीवन के पांच साल बिताने पड़े मुझे वहां !

सहसा एक दिन किसान की पत्नी किसान के पीछे पड़ गई कि उसे कौंधनी ( एक प्रकार का जेवर ) चाहिए किसान अपनी पत्नी की बात कैसे टालता उसने धरती खोदकर मुझे अपनी भाईयों के साथ बाहर निकाला ! मै बहुत प्रसन्न हुआ लेकिन कुछ ही समय के लिए, मुझे सुनार के यहाँ भेज दिया गया ! मै अपनी पहली अग्नि परीक्षा का ध्यान कर काँप गया ...पहली अग्नि परीक्षा ? मैंने बीच में ही उसे टोकते हुए पूछा ! हाँ इसके पहले भी मेरी सीता की तरह अग्नि परीक्षा हुयी थी, वह इसके पहले की कहानी है ..."ओह बड़ी दुखद कहानी है फिर क्या हुआ मैंने पूछा" ! मेरे भाईयों को सुनार ने धीरे- धीरे अग्नि की भेंट चढ़ा दी सौभाग्य से मेरा नंबर आने से पहले ही कौंधनी की नाप की संख्या पूरी हो गई इस तरह मै बच गया और भगवान को लाख लाख धन्यवाद  दिया !

उस घटना के बाद भ्रमण करता हुआ मै शहर आ गया ! देशाटन करने में मुझे विशेष आनंद आता था, कभी अयोध्या कभी उज्जैन, कभी काशी तो कभी कानपूर कहने का मतलब कि मैंने देश का कोना-कोना झाँक कर देखा ! जहाँ भी पंहुचा लोगों ने मेरा भरपूर स्वागत किया ! गरीब के झोंपड़े से लेकर राजप्रासादों तक, रानियों के सन्दुक से लेकर आज पढ़ी लिखी लेडी के पर्स में पंहुच गया ! ब्यूटी पार्लर में, किटी पार्टियों में अंधाधुंध मुझे खर्च करती महिलाओं को देखकर दुःख के साथ एक ख़ुशी भी हुई कि चलो वे आर्थिक दृष्टया सक्षम तो हुई है !

अब मै अपनी प्रशंसा कहाँ तक करूँ संसार के अच्छे बुरे कृत्य मेरे द्वारा पुरे होते है ! आज का युग तो मुझे ईश्वर की ताकत से ज्यादा ताकतवर मानता है हर घर घर में मेरी पूजा होती है ! मुर्ख को विद्वान बनाना मेरे बाए हाथ का खेल है ! रंक को राजा बनाना पापी को पुण्यात्मा बनाने की ताकत मै रखता हूँ अर्थात आज के युग में मै सर्वशक्तिमान हूँ ! वह अपनी प्रशंसा करता ही जा रहा था ...इतने में मैंने उसे टोकते हुए कहा "लेकिन तुम मूल रूप से रहने वाले कहाँ के हो" ? उसने अपनी आँखे बंद की फिर अपने अतीत में खो गया !

मेरा जन्म उत्तरी अमेरिका के मैक्सिको प्रदेश में आज से युगों पूर्व हुआ था ! पृथ्वी को खोदकर मुझे बाहर निकाला गया ! जबरदस्ती निर्दयतापूर्वक मुझे मजदूरों ने मेरी माँ की ममतामई गोद से छिनकर बाहर निकाला ! इस बात का दुख तो बहुत हुआ पर कुछ संतोष भी हुआ कि प्रकाश जैसी कोई चीज भी इस संसार में है इसका मुझे पता नहीं था ! धरती के भीतर अंधकार में ही मेरी दुनिया थी और यही मेरा स्वर्ग था, जैसा भी हो पर अपना घर अपना ही होता है ! मजदूरों ने बड़ी निर्ममता से मुझे बाहर निकाल कर जलती अग्नि की भयानक लपटों में मुझे डाल दिया ! मेरा सारा शरीर पिघल गया, घोर कष्ट उठाना पड़ा था तब, परिणामस्वरूप मेरे भाई जो मेरे साथ आये थे दूर हो गए ! मेरा शरीर पिघलकर पानी जैसा हो गया था, बाहर आकर हवा की ठण्ड पाकर मै जम गया तो पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बन गया था, जैसे चन्द्र रश्मियों के समान मेरी चमक थी और धवल दूध के समान धवल हो गया था इसलिए मुझे लोगों ने चांदी नाम रख दिया था ! 

मुझे बचपन में ही जहाज से दूर यात्रा करने का सुअवसर मिल गया ! मै एक देश से दुसरे देश यात्रा करते हुए भारत भेज दिया गया ! भारत में मुझे विशेष स्नेह से अपने गोदियों में भरकर जहाज से उतारा गया, जैसे किसी नई बहु का स्वागत होता है घर में, वैसे ही मेरा स्वागत हुआ ! यहाँ की सरकार ने फिर मुझे कलकत्ते की टकसाल में भेज दिया ! वहां फिर एक बार मेरी अग्निपरीक्षा हुई भट्टी में जलाया गया बड़े-बड़े कारीगरों ने मिलकर मेरे छोटे-छोटे टुकडे बना दिए ! दुःख तो बहुत हुआ पर क्या करता सब कुछ सहना पड़ा ! मेरी देह चंद्रमा की तरह गोल बना दी गई ! मेरा दुल्हन की तरह श्रुंगार किया गया ...मेरे एक और तत्कालीन सम्राट जार्ज पंचम का स्वरूप बनाया गया दूसरी और मेरा नाम लिखा गया और जन्म तिथि भी लिखी गई जिससे मेरी आयु का पता चले ! टकसाल के पंडितों ने मेरा नामकरण किया और तबसे लोग मुझे रूपया कहकर बुलाने लगे, यहाँ से शुरू हुई थी  मेरी जीवन यात्रा, आगे की सारी कहानी तो तुम जानती ही ही, अब तो तुम समझ ही गई होगी मै स्त्री से पुरुष कैसे बना  ? रुपये ने एक लंबी सांस लेते हुए अपनी आपबीती सुनाई !

हाँ भाई जानती हूँ, बड़ी दुखद कहानी है तुम्हारी लेकिन मुझे तुमसे सहानुभूति है मैंने ऐसे ही तुझे भाई नहीं कहा है ! मै जानती हूँ हर बुरे वक्त में तू ही सगे भाई की तरह मेरे काम आया है ! मेरे ही क्यों दुनिया में लोगों की निन्न्यानव प्रतिशत समस्याएं तू ही दूर कर देता है ...तू परहित के लिए अपनी जीवन की बाजी लगा देता है ! तुम्हारा जीवन सच में त्यागमय है ! दूसरों को सुख देकर तू सुखी होता है ! लेकिन कुछ लोग अपने स्वार्थवश तुझे दबाकर रख लेते है यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती लेकिन तुम फ़िक्र मत करना सुख दुःख धुप छाँव की तरह होते है आते है चले जाते है !कभी गिरना कभी उठना, शायद इसी का नाम जिंदगी है लेकिन हर हाल में तुम लोगों की जुबान पर रहोगे भाई !