गुरुवार, 3 जुलाई 2014

जाने का उत्सव भी मनायें …

यदि,
जन्मदिन एक उत्सव है तो 
मृत्यु दिन का मातम क्यों ? 
उत्सव क्यों नहीं हम मनाते 
सोच कर देखा जाय तो 
न हम जन्म लेते है 
न हम कभी मरते है !
दरअसल हम एक ग्रह से 
दूसरे ग्रह पर केवल 
विजिट वीजा पर 
आते-जाते रहते है !
और इस आने जाने के 
बीच में हम हमारे 
नाम,धाम,जाती,धर्म 
उससे जुड़े सुख-दुःख 
उससे जुडी समस्याओं 
में फंस कर 
शब्द,विचार,शास्त्र,
सिद्धांतो के चक्कर में 
पड कर  
यह भूल ही जाते है 
कि तिथि के अनुसार 
हम पृथ्वी ग्रह पर
विजिट करने आये थे 
तो एक दिन जाना 
भी पड़ेगा  !
यदि आने का उत्सव 
मनाया है तो, क्यों न 
जाने का उत्सव भी 
हंसी ख़ुशी से मनायें 
क्योंकि,
और भी विजिटर्स 
लाईन में खड़े है यहाँ 
आने के लिये   .... !!

शुक्रवार, 20 जून 2014

शब्दकोष से निकल कर …

उफ्
मेरे भीतर
भीड़ 
मेरे बाहर 
भीड़ 
भीड़ ही भीड़ 
ऐसे लग रहा है 
जैसे … 
विचार नहीं 
सड़क पर 
दौड़ रही है 
ट्रैफिक,
जरा शब्दकोष से 
निकल कर 
बाहर तो 
आ जाओ 
  शांति     … !!

शुक्रवार, 9 मई 2014

माँ ..

            
  बिटिया ने बनाया हुआ स्केच !

सीता इतिहास मे 
हुयी भी थी या नहीं 
मुझे पता नही लेकिन,
उसके होने के जीवित 
प्रमाण मौजूद है 
आज भी माँ के 
अस्तित्व में !
न खुल कर कुछ 
कह पायी थी कभी 
न खुल कर हंस 
पायी थी कभी  
पति के रामराज मे, 
कर्तव्यों की बलिवेदी पर 
अपनी भावनाओं की 
बलि चढ़ाती  माँ !
पिता के जाने के 
बरसो बाद भी 
न खुल कर कभी 
रो पाती है अपने 
बेटों के राज मे 
माँ … !!
                                      

शनिवार, 3 मई 2014

एक सुहानी शाम ...

एक सुहानी शाम 
बाहों में बाहें डाल  
मेरी प्यारी बिटिया ने कहा,
ममा तुम कितनी अच्छी हो 
कितनी प्यारी हो मुझे 
तुम पर है गर्व !
जब भी स्कूल से शाम 
घर आती हूँ  
लगता है घर स्वर्ग !
मै भी बड़ी होकर 
तुम्हारी जैसी बनूंगी 
कहलाउंगी गुणी !
कुछ उदास सी होकर
 मै उसको बोली 
बेटा,
छाया का क्या अस्तित्व 
कैसा जीवन ??
जब कि आत्मनिर्भरता का 
आज है जमाना !
अक्सर तेरे पापा देते है ताना 
सुबह अखबार भी छूती हूँ 
तो कहते है    … 
तुझे कौनसे दफ्तर है जाना 
दिनभर घर मे रहती हो 
आराम से पढ़ लेना !
गृहिणी के काम का न 
होता कोई मूल्यांकन 
न कोई प्रशंसा ! 
तभी कहती हूँ बेटा,
खूब पढ़ लिखकर 
डॉक्टर बनना इंजीनियर बनना 
मेरी जैसी नहीं 
तुम अपने जैसी बनना !
तुम मेरा प्रतिबिंब हो भले ही 
मेरी परछाई कभी न बनना ! 
बिटिया उसकी रुचि के अनुसार 
आज इंजीनियर बन गयी है !
पिछले तीन-चार महिने से 
एक प्रतिष्ठित कंपनी मे 
जॉब भी कर रही है !
अच्छे खासे पैसे कमा रही है 
एक राज की बात बताऊँ ?
आजकल वही मेरी 
ए टी एम भी है  … :)
कभी सुना था मैने  
बेटा अपने माता-पिता को 
स्वर्ग ले जाता है !
लेकिन आज देख रही हूँ 
बेटी स्वर्ग को ही 
घर पर लाते हुए ...
सुबह दो दो अख़बार 
के साथ      .... :)



रविवार, 27 अप्रैल 2014

नकारात्मक विचार ...

बात तब की है जब बुद्ध वृद्ध हो गए थे, तब एक दोपहर एक वन में एक वृक्ष के निचे विश्राम करने रुक गए थे ! 
उन्हें प्यास लगी थी ! आनंद पानी लाने पास के पहाड़ी झरने पर गए ! पर झरने में से अभी-अभी बैल गाड़ियां गुजरी थी ! इसलिए झरने का सारा पानी गन्दा हो गया था ! कीचड़ ही कीचड़ और सड़े पत्ते पानी पर उभर आये थे ! आनंद उस झरने का पानी लिये बिना ही वापस लौट आये थे ! उन्होंने  बुद्ध से कहा "झरने का पानी निर्मल नहीं है, मै पीछे लौटकर नदी से पानी ले आता हूँ!" नदी बहुत दूर थी ! बुद्ध ने आनंद को उसी झरने का पानी लाने वापस लौटा दिया ! आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट आये थे ! वह पानी उन्हें लाने योग्य नहीं लगा ! पर बुद्ध ने इस बार भी लौटा दिया ! और तीसरी बार जब आनंद झरने पर पहुंचे  तो देखकर चकित रह गये, झरने का पानी अब बिलकुल निर्मल और शांत दिखाई दे रहा था ! सारी कीचड़ पानी के निचे 
बैठ गई थी ! जल निर्मल और साफ़-सुथरा पीने योग्य हो गया था ! 


जब भी हमारे नकारात्मक विचार भी कुछ ऐसे ही चेतना रूपी झरने पर से गुजरने लगते  है तो न स्वयं के ग्रहण करने योग्य होते है न दूसरों को बांटने योग्य ही होते है ! जिनके ग्रहण करने से हम खुद को दुखी  कर लेते है और उसे बांटकर दुसरे को भी दुख़ी कर देते है ! ऐसे में बस थोड़ी देर धैर्य और शांति के साथ चेतना रूपी झरने के किनारे बैठकर साक्षी रुप से प्रतीक्षा करने की जरुरत होती है तब, और धीरे-धीरे आप चकित रह जायेंगे यह देखकर कि नकारात्मक विचार अपने आप विसर्जित होने लगे है ! 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मुखौटे ...

हर दिन,
हर रिश्ता हमें 
सौ प्रतिशत अटेन्शन 
मांगता है 
अनंत रिश्तों से
जुड़े हुए हम 
जब ऐसा नहीं 
कर पाते तब 
एक कुशल 
अभिनेता की तरह 
अभिनय करने लगते है 
अनंत मुखौटे 
ओढ़ कर दिन भर,
और अभिनय 
करते-करते जब 
थक जाते है 
सोने से पहले
रात की खूंटी पर 
टांग देते है सारे 
मुखौटे उतार कर 
तब पहचान ही 
नहीं पाते कि 
हमारा असली 
चेहरा कौनसा है   … ??

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

मेरी प्रिय कहानी …


समर्थ रामदास जी के जीवन काल में घटी एक प्यारी सी कहानी है यह जो कि मेरी प्रिय कहानी है ! संत रामदास एक बार रामायण की कथा सुना रहे थे दूर-दूर से लोग कथा श्रवण करने आने लगे हनुमान को भी इस बात की खबर लग गयी ! हनुमान भी कंबल ओढ़ कर जिज्ञासावश नियमित कथा श्रवण करने आने लगे कि देखे यह आदमी हजारो साल पहले घटी घटना को सच कहता है या झूठ कहता है यह देखने !  लेकिन रामदास हमेशा ऐसे कथा को प्रेम से कहते जैसे उन्होंने अपने आँखों देखि कह रहे हो, लेकिन एक दिन एक जगह थोड़ी मुश्किल हो गयी ! कथा में एक जगह समर्थ ने कहा कि "हनुमान लंका गए अशोक वाटिका में सीता से मिलने तो वहाँ उन्होंने देखा कि चारो तरफ सफ़ेद ही सफ़ेद फूल खिले हुए है "!  हनुमान जी श्रोताओं में कंबल ओढ़कर छिपे बैठे थे, गुस्से में आ गए कंबल फ़ेंक कर खड़े हो गए ! और कहा कि "यह बात झूठ है और तो सब कथा ठीक है मगर सफ़ेद फूलों वाली घटना बिलकुल झूठ है इसमे संशोधन करो "! फूल सफ़ेद नहीं थे, फूल लाल थे ! 

रामदास भी कहाँ मानने वाले थे, कहा अपनी बकवास बंद कर और चुपचाप शांति से कथा का आनंद लो, यह तुम्हारा काम नहीं यह निर्णय करना कि फूल सफ़ेद थे या लाल थे, मैंने जो कह दिया सो कह दिया रामदास संशोधन नहीं करता ! हनुमान ने कहा यह तो हद्द हो गयी मै  खुद गवाह हूँ इस बात का मै खुद अशोक वाटिका में गया था तुम कभी गए ही नहीं तो फिर कैसे कह सकते हो कि फूल सफ़ेद थे ! दोनों के बीच जब झगड़ा अधिक बढ़ा तो हनुमान ने गुस्से से कहा कि "फिर श्री राम के पास चलते है वही इसका निर्णय करेंगे" और रामदास को राजी कर अपने  कंधे पर बिठाकर श्री राम के पास चल दिए ! श्री राम जी ने अपने दोनों प्रिय भक्तों की बात ध्यान से सुनकर हनुमान से कहा    … "हनुमान तुम नाहक इन बातों में मत उलझो रामदास ठीक कहता है फूल सफ़ेद ही थे ! हनुमान का क्रोध बढ़ता ही जा रहा था यह तो ज्यादती हो गयी हनुमान ने सीता से पूछा अब तो वही मात्र इस घटना की गवाह थी ! सीता ने कहा "हनुमान तुम इस कथा के झंझट में मत पड़ो मैंने भी देखा था अशोक वाटिका में फूल सफ़ेद ही थे लेकिन तुम क्रोध से इतने भरे थे कि तुम्हारी आँखे लाल सुर्ख हो गयी थी इसलिए तुम्हे सफ़ेद फूल लाल दिखायी दे रहे थे "!

याद कीजिये हम भी कहीं ऐसे ही किसी की पोस्ट तो पढने नहीं जाते है ?? किसी के विचारों का यूजफुल होना यूजलेस होना हमारी आँख पर हमारी धारणाओं पर तो निर्भर नहीं करता ?? कि हम किस प्रकार से उस पोस्ट को पढ़ रहे है ! अगर हम उस पोस्ट में सार्थक की जगह हमारी धारणाओं की वजह से निरर्थक को ही देख रहे है और आँखे गुस्से से लाल है दुश्मनी से मन लहूलुहान है फिर तो कुछ भी सार्थक कैसे दिखायी देगा ! ऊपर की कहानी में सच में ऐसा हुआ या नहीं यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, कहानियाँ सिर्फ प्रतीकात्मक होती है और समय के साथ बदलती रहती है !