मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

मेरी प्रिय कहानी …


समर्थ रामदास जी के जीवन काल में घटी एक प्यारी सी कहानी है यह जो कि मेरी प्रिय कहानी है ! संत रामदास एक बार रामायण की कथा सुना रहे थे दूर-दूर से लोग कथा श्रवण करने आने लगे हनुमान को भी इस बात की खबर लग गयी ! हनुमान भी कंबल ओढ़ कर जिज्ञासावश नियमित कथा श्रवण करने आने लगे कि देखे यह आदमी हजारो साल पहले घटी घटना को सच कहता है या झूठ कहता है यह देखने !  लेकिन रामदास हमेशा ऐसे कथा को प्रेम से कहते जैसे उन्होंने अपने आँखों देखि कह रहे हो, लेकिन एक दिन एक जगह थोड़ी मुश्किल हो गयी ! कथा में एक जगह समर्थ ने कहा कि "हनुमान लंका गए अशोक वाटिका में सीता से मिलने तो वहाँ उन्होंने देखा कि चारो तरफ सफ़ेद ही सफ़ेद फूल खिले हुए है "!  हनुमान जी श्रोताओं में कंबल ओढ़कर छिपे बैठे थे, गुस्से में आ गए कंबल फ़ेंक कर खड़े हो गए ! और कहा कि "यह बात झूठ है और तो सब कथा ठीक है मगर सफ़ेद फूलों वाली घटना बिलकुल झूठ है इसमे संशोधन करो "! फूल सफ़ेद नहीं थे, फूल लाल थे ! 

रामदास भी कहाँ मानने वाले थे, कहा अपनी बकवास बंद कर और चुपचाप शांति से कथा का आनंद लो, यह तुम्हारा काम नहीं यह निर्णय करना कि फूल सफ़ेद थे या लाल थे, मैंने जो कह दिया सो कह दिया रामदास संशोधन नहीं करता ! हनुमान ने कहा यह तो हद्द हो गयी मै  खुद गवाह हूँ इस बात का मै खुद अशोक वाटिका में गया था तुम कभी गए ही नहीं तो फिर कैसे कह सकते हो कि फूल सफ़ेद थे ! दोनों के बीच जब झगड़ा अधिक बढ़ा तो हनुमान ने गुस्से से कहा कि "फिर श्री राम के पास चलते है वही इसका निर्णय करेंगे" और रामदास को राजी कर अपने  कंधे पर बिठाकर श्री राम के पास चल दिए ! श्री राम जी ने अपने दोनों प्रिय भक्तों की बात ध्यान से सुनकर हनुमान से कहा    … "हनुमान तुम नाहक इन बातों में मत उलझो रामदास ठीक कहता है फूल सफ़ेद ही थे ! हनुमान का क्रोध बढ़ता ही जा रहा था यह तो ज्यादती हो गयी हनुमान ने सीता से पूछा अब तो वही मात्र इस घटना की गवाह थी ! सीता ने कहा "हनुमान तुम इस कथा के झंझट में मत पड़ो मैंने भी देखा था अशोक वाटिका में फूल सफ़ेद ही थे लेकिन तुम क्रोध से इतने भरे थे कि तुम्हारी आँखे लाल सुर्ख हो गयी थी इसलिए तुम्हे सफ़ेद फूल लाल दिखायी दे रहे थे "!

याद कीजिये हम भी कहीं ऐसे ही किसी की पोस्ट तो पढने नहीं जाते है ?? किसी के विचारों का यूजफुल होना यूजलेस होना हमारी आँख पर हमारी धारणाओं पर तो निर्भर नहीं करता ?? कि हम किस प्रकार से उस पोस्ट को पढ़ रहे है ! अगर हम उस पोस्ट में सार्थक की जगह हमारी धारणाओं की वजह से निरर्थक को ही देख रहे है और आँखे गुस्से से लाल है दुश्मनी से मन लहूलुहान है फिर तो कुछ भी सार्थक कैसे दिखायी देगा ! ऊपर की कहानी में सच में ऐसा हुआ या नहीं यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, कहानियाँ सिर्फ प्रतीकात्मक होती है और समय के साथ बदलती रहती है ! 

शनिवार, 29 मार्च 2014

एक अप्रैल याने की मूर्ख दिवस …

एक अप्रैल हर साल मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है ! यूँ तो एक अप्रैल याने की मूर्ख दिवस पश्चिम देशों का त्यौहार है लेकिन अब तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया ने इस त्यौहार को दिल से अपना लिया है ! ओशो प्रेमी इस दिन को मुल्ला नसरुद्दीन दिवस के रूप में मनाते है और मुल्ला नसरुद्दीन के चुटकुलों का भरपूर स्वाद लेते है सबका मनोरंजन करते है ! मूर्ख दिवस के अलग-अलग देशों में अलग अलग मान्यताएं, किस्से, कहानियाँ प्रचलित है लेकिन हमारे यहाँ तो रोज की पति-पत्नी की बाते हो या बच्चों की बाते या फिर नेताओं की बाते हो इन शुद्ध देसी दैनंदिन हास्य पूर्ण बातों  का एक अलग ही मजा अलग ही स्वाद होता है ! पति चाहे कितनी ही बड़ी  पोस्ट पर क्यों न हो दुनिया के लिए वह कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो लेकिन हर पत्नी की नजर में तो उसका पति घर में मूर्ख, बेवकूफ ही बना रहता है ! और वह नाते रिश्तेदारों में, आस पड़ोस में, सखी सहेलियों में बतियाते एक भी ऐसा मौका नहीं गंवाती उसे मूर्ख साबित करने का ! बेचारा पति हमेशा चुप रहने में ही अपनी भलाई समझता है यह सोचकर कि कौन इस मूर्ख औरत के मुँह लगे ! इसी तरह एक दूसरे को मूर्ख समझने में साबित करने में ही उम्र तमाम बीत जाती है !  

बड़े तो बड़े हमारे बच्चे भी कुछ कम नहीं होते, अभी कल की ही बात है मै अपनी सहेली के साथ उसके घर पर शाम की चाय के साथ गप-शप कर रही थी , पास में उसकी बहु अपने बेटे बंटी को हिंदी का गृह कार्य करा रही थी बंटी की मम्मी ने कहा "बेटे शेर और बिल्ली का वाक्य में प्रयोग करो तो " आपको पता है बंटी ने क्या लिखा उसकी कॉपी में  ?… "पापा जब ऑफिस से घर आते है तो बिलकुल शेर की तरह आते है और घर में बिल्ली की तरह प्रवेश करते है " अब क्या बताएं हंस हंस कर मेरा तो बुरा हाल हुआ था !   

राजनीति में तो आजकल होड़ सी लगी है जनता को मूर्ख बनाने की, हर कोई नेता एक दूसरे को मूर्ख बता कर जनता को कैसे मूर्ख बनायें वोट कैसे बटोरे कुर्सी तक कैसे पहुंचे यही सोच कर कोई मुफ्त की चाय पिला रहा है कोई भाषण पिला रहा है मकसद सिर्फ सेवा की आड़ में मेवा खाना और क्या ! एक नेता चुनावी सभा में जनता को समझा रहे थे ! लेकिन जनता ने बड़ी हुड़दंड मचाई हुई थी हो-हल्ला होने लगा ! नेताजी ने नाराज हो कर गुस्से से कहा  … "लगता है इस सभा में सारे मूर्ख गधे इकट्ठे हो गए है ! क्या अच्छा नहीं होगा कि एक बार में एक ही बोले ?? तभी सभा में से किसी व्यक्ति की आवाज आयी "ठीक है तब आप ही शुरू कीजिये !   

मूर्ख दिवस की एक यह भी विशेषता होती है की इस दिन मूर्ख से मूर्ख भी रसिक बनकर जीवन का रस लेने लगता है हंसना हंसाना एकमेव उद्देश होता है न की किसी के मन को ठेस पहुँचाना ! अब चारो ओर से मूर्खों से घिरा कोई खुद को बड़ा बुद्धिमान समझता हो तो उससे बड़ा मूर्ख और कोई हो सकता है क्या, नहीं न ??

गुरुवार, 13 मार्च 2014

सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामनायें ..

हर साल की तरह मौज,मस्ती,रंग,तरंग लिए होली हमारे द्वार पर दस्तक दे रही है ! सर्द हवाओं की सिहरन सूरज की तप्त होती किरणों से जैसे बौखलाई सी लगने लगी है और पहाड़ों के आँचल में छुपने का प्रयास कर रही है ! वन, उपवन, बाग़-बगीचों में कोयल की मीठी कुहू-कुहू सुनायी देने लगी है ! आम्र वृक्षों पर बौराई मंजरियों की सुगंध, कच्चे कैरियों की महक से हवाओं में अनोखी खुशबु भर रही है ! इस मौसम में गाँव में दूर-दूर तक पियराये सरसों के पीले खेत,गेहूं की लहलहाती फसले दिखायी देने लगती है ! अगर इस मौसम का लुत्फ़ उठाना है तो हमारे गाँव आना होगा, शहर में ऐसे नज़ारे कहाँ  ?? खैर सर्द मौसम की विदाई और ग्रीष्म का आगमन हम सबके मन को भाने लगता है ! बदलते मौसम के साथ, बदलते रंगों के साथ हमारे चारो और जीवन का नव विकास दिखायी देने लगता है ! रूटीन जीवन मनुष्य के मन को नीरस बना देता है रोज वही सब काम करो कितना बोरिंग लगता है न ? जिससे मनुष्य एक मशीन की तरह हो जाता है मानसिक तनाव से भर जाता है ! शायद इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर हमारे त्यौहार बने होंगे ताकि मनुष्य अपनों के साथ कुछ पल बैठकर हंस बोल सके नाच गा सके, होली ऐसा ही एक त्यौहार है जिसमे रंग है मस्ती है हास परिहास है ! लेकिन कुछ लोग इस मनभावन उत्सव को भी हानिकारक रंग लगाने कीचड़ फेंकने का उत्सव बना देते है ! बुरा न मानो होली है कहकर दिल खोलकर गंदी-गंदी गालियां बक देते है और इसको कहते है होली !  बाहर के त्यौहार बाहर के रंग सब संकेत है हमारे भीतर मुड़ने के लिए, देखिये न संत गुलाल क्या खूब कहते है इन पंक्तियों को पढ़कर हमें भी असली होली की याद आ ही जाती है   … 

                      सतगुरु घर पर परलि धमारी, होरिया मै खेलौंगी !
                      जूथ जूथ सखियां सब निकरि, परलि ज्ञान कै मारी !
                      अपने प्रिय संग होरी खेलौं, लोग देत सब गारी !
                      अब खेलौं मन महामगन हुवै, छूटलि लाज हमारी !
                      सत् सुकृत सौ होरी खेलौं, संतन की  बलिहारी  !
                      कह गुलाल प्रिय होरी खेलौं, हम कुलवंती नारी !!

                     

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

वह नारी है ....

न दीन है 
न हीन है 
है भिन्न 
न कमतर है 
जो हर घर-घर की धुरी है 
वह नारी है   .... 

बेटी है 
बहन है 
पत्नी है 
माँ है 
जो नहीं किसी की परछाई है 
वह नारी है    …. 

सुशिल है 
सुकोमल है 
सहनशील है 
ह्रदय है 
जो हर रिश्ते पर वारी है 
वह नारी है   .... 

आत्मविश्वासु है 
दृढ़निश्चयी है 
आत्मनिर्भर है 
स्वयंसिद्ध निरंतर 
जो प्रगतिपथ पर अग्रसर है 
वह नारी है  .... 

ओज है 
सोज है  
सरोज है 
काव्यमय 
जो अपने अस्तित्व की खोज में है 
वह नारी है 
वही क्रांति है    .... !!

( सभी महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की 
हार्दिक शुभकामनायेँ )

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

आम को खास होने की क्या जरुरत थी ?

कमल प्रतियोगिता 
नहीं करता गुलाब से 
गुलाब जैसा होने की 
गुलाब फ़िक्र नहीं करता 
कमल जैसा होने की 
क्या जूही क्या चमेली 
नीम की कड़वाहट में 
औषधीय गुण देख कर 
मुग्ध होती है कचनार 
की कलि, 
आम अपने खट्टे मीठे 
सहज स्वाभाविक गुण में 
कितना लोकप्रिय था 
उसे खास होने की 
क्या जरुरत थी ??
खास होने के चक्कर में 
उसने अपनी सहज 
स्वाभाविकता खो दी  … !

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

हमारे महानगरों में कूड़ा कचरा एक भयावह समस्या …


कल कूड़े कचरे पर सतीश सक्सेना जी की लिखी रचना पढ़ रही थी, उनकी रचना ने मुझे इस लेख को आप तक पहुँचाने के लिए प्रेरित किया आभार सतीश जी ! कूड़ा कचरा आज हमारे महानगरों में एक भयावह समस्या बनती जा रही है ! कचरा किसी के लिए व्यर्थ की चीज है तो किसी के लिए अनर्थ और किसी के लिए जीवन जीने के लिए उपयोगी है ! कैसे आईये इस लेख द्वारा जानते है ! इस लेख को लिखा है न्यूयार्क के एक लेखक ने नाम है एंड्रूऑडो पोर्टर ने और हम तक पहुंचाया है ओशो प्रेमी अनिल सरस्वती ने ! अनिल जी, अगर आप मुझे पढ़ रहे है तो आभार इस महत्वपूर्ण लेख के लिए !

पोर्टर लिखता है    … "मै एक लेखक हूँ, मेरी अच्छी खासी आय है, मेरे पास सुविधाओं का भंडार है ! बस कमी है तो एक चीज की, वह है समय ! मेरे घर में उपयोग के बाद बहुत सी प्लास्टिक और कांच की बोतले जमा होती रहती है जिन्हे मै सुपर मार्केट में जाकर लौटा सकता हूँ और बदले में मुझे मिलेंगे  ५ सेंट प्रति बोतल ! यदि मै बीस बोतलें लौटाता हूँ तो एक डॉलर मिलता है ! अब जितना समय मै इन बोतलों को जाकर लौटाने में लगाउंगा उससे कही अधिक मूल्य का समय गँवा दूंगा ! मै इन बोतलों को कचरे में फ़ेंक देता हूँ ! इस कचरे को उठवाने के लिए मै नियमित रूप से पैसे देता हूँ ! जहाँ मेरे लिए प्लास्टिक की बोतलों का कोई मूल्य नहीं वही भारत में कचरा बीनने वाले बच्चे के इन दो रुपये प्रति बोतल से भरी एक बोरी बड़ी मूलयवान है क्योंकि आज उसने अपना खाना नहीं खाया है "!
पोर्टर आगे लिखता है "जहाँ नार्वे के निवासी अपने कचरे को उठवाने और उसे छांटने के लिए  ११४ डॉलर प्रति टन भुगतान करने के लिए तैयार वही बहुत से देशों के किसान इस कचरे को अपने खेतों में खाद की भांति उपयोग करने के लिए पैसे देते है !"
तारा बाई एक दस वर्षीय बच्ची है जो मुम्बई के कूड़ेदानो से प्लास्टिक और धातुओं से बनी चीजों को इकठ्ठा करती है ! जब उससे पूछा गया कि क्या उसे अपने काम से नफरत है तो वह गुस्से से सर हिलाती हुई बोली, 'नफरत का सवाल ही नहीं है, मै इस काम के कारण जिन्दा हूँ !"
तारा एक किसान की बेटी है ! उनके गांव में आयी बाढ़ से बर्बाद हो वे मुंबई आ गए पर भीख मांगना गंवारा न था तो उसका परिवार कचरा बीनने लगा ! कचरे के ढेरों में रेंगते कीड़ों के बीच से उठाना होता है उन्हें अपनी आजीविका का साधन !
कोई नहीं जानता भारत में कितने कचरा बीनते बच्चे है ! मात्र राजधानी दिल्ली में  ३००००० कचरा बीनने वाले है ! यह आठ घंटा काम करके ५० से १०० रुपये तक कमाते है ! इनके अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था चिंतन के अनुसार वे दिल्ली नगर पालिका के ६०००००  रुपये प्रतिदिन बचाते है ! जो काम प्रशासन को करना चाहिए वह बच्चे कर रहे है ! अपने आजीविका के लिए काम कर रहे यह बच्चे  ५० रुपये प्रतिदिन कमाने के लिए प्रत्येक दिन एक भयावह जीवन जीते है ! इन्हे अपनी चपेट में लेने वाले रोगों की सूचि में कैंसर,दमा,टीबी और चर्म रोग शामिल है !
इस असहनीय कार्य से पैदा हुए प्रभाव को कम करने के लिए यह बच्चे कच्ची आयु में ही धूम्रपान, शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते है !
अब इन कचरा बीनते बच्चों के पास कोई चुनाव नहीं है ! उन्हें जीवित रहने के लिए अपने जीवन को खतरे में डालना अनिवार्य है ! लेकिन पोर्टर और हम में से वे लोग जिनके पास चुनाव सुविधा है, अपने प्रयास कर सकते है !
भारत के महानगरों में घरों से निकलने वाला कचरा एक भयावह समस्या बनता जा रहा है!
मुंबई का सबसे बड़ा कचरा संग्रह देवनार कचरा स्थल पर होता है ! ११० हेक्टेयर में फैली इस जगह पर ९२ लाख टन कचरे का ढेर लगा है ! मुंबई के घरों से हर रोज  १०००० टन कचरा निकलता है !
देवनार इलाके के पास बसी बस्तियों में प्रत्येक  १००० से ६० बच्चे जन्म लेते ही मर जाते है ! बाकी मुंबई में यह औसत ३० बच्चे प्रति हजार है ! इसके पास रहने वाले लोग मलेरिया, टीबी, दमा और चर्म रोगों से ग्रसित रहते है !
राजधानी दिल्ली भी इससे पीछे नहीं है ! १९५० से लेकर आज तक यहाँ १२ बड़े कचरे संग्रह स्थल बनाये जा चुके है जिनमे लाखों टन कचरा जमा है ! एक जगह पर कचरे का ढेर सात मंजिला ऊँचा है ! इनमे कचरा जमा करने की क्षमता तेजी से घट रही है !
भारत में बढती हुयी जनसँख्या और विकास दर के साथ यह समस्या एक विकराल रूप लेती जा रही है !
भारत में २०२० तक जनसंख्या का अनुमान  … १,३२,०००००० लोग ! भारत में प्रत्येक व्यक्ति आधा किलो कचरा रोज उत्पन्न करता है ! इस गणित से पूरा भारत हर दिन २०२० में  ६,६०,०००  टन कचरा पैदा करेगा यह सारा कचरा कहाँ जायेगा किसी को कोई अनुमान नहीं !  

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

रहिमन धागा प्रेम का ....


"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय , 
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय " !!
जिस प्रकार धागा टूटने पर जुड़ नहीं सकता यदि जोड़ भी दे तो गांठ पड़ जाती है उसी प्रकार प्यार के रिश्तों में भी  एक बार दरार पड़ जाय तो  जुड़ना मुश्किल हो जाता है, अविश्वास की गांठ पड़ ही जाती है  उस रिश्ते  में  ! सच  कह रहे है महाकवि रहीम प्रेम बड़ा नाजुक धागा है इतना नाजुक कि इन आँखों से दिखायी भी नहीं  देता और मजबूती से बांध देता है रिश्तों को  ! इगो तोड़ देता है  और प्रेम जोड़ देता है एक व्यक्ति को व्यक्ति से, व्यक्ति को प्रकृति से , और ईश्वरीय परम सत्ता से  !  
साधारणता आज के आधुनिक युग में  आधुनिक युवा प्रेम को महंगे महंगे उपहारों के लेन -देन  के रूप में ही जानने लगे है  अन्य रिश्तों के साथ-साथ प्रेम जैसे पवित्र  रिश्ते को भी सस्ता बना दिया है  ! दोनों तरफ से ह्रदय के पात्र   बिलकुल खाली  हो  तो ऐसे में  कौन किसको प्रेम दे  ??  भिखमंगों  जैसी अवस्था हो गयी है  ! इसी वजह से आज  घर-परिवारों में कलह क्लेश ने जीवन को नरक बना दिया है  ! ह्रदय का पात्र प्रेम से लबालब भरा  हो तभी प्रेम देना संभव  है लेकिन इसे भरने  की  संभावना तभी संभव है जब  इधर से कोई मांग अब  मन में नहीं बची है  !
 प्रेम  व्यक्ति  को  एक नया व्यक्तित्व देता है  भले ही बड़ी गाडी , बडा बंगला , भरपूर बैंक बैलेंस उसके पास न हो पर प्रेम  की  आकूत संपदा  जिसके पास है वही धनवान है मेरे हिसाब से  ! लोभ और लालच पर टिके हुए रिश्ते देर सवेर टूट ही जाते है  !