शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

सपना और यथार्थ …

एक प्राचीन कथा के अनुसार ब्रम्हा ने जब सृष्टि की रचना की तो साथ में यथार्थ और सपने को भी बनाया था ! पर जैसे ही दोनों की रचना हुयी झगडा शुरू हुआ दोनों में कौन श्रेष्ठ है  इस बात का ! यथार्थ ने कहा तुमसे मै श्रेष्ठ हूँ ! सपने ने कहा की मै श्रेष्ठ हूँ ! दोनों का झगडा ब्रम्ह देव तक गया ! दोनों को यूँ झगड़ते देख ब्रम्हा ने कहा अभी सुलझाते है प्रयोग से इस झगड़े को ! उन्होंने कहा कि, तुम में से जो भी अपने पैर जमीन पर गड़ाकर आकाश को छू लेगा वही श्रेष्ठ है ! ब्रम्हा की बात सुनते ही ततक्षण सपने ने आकाश को छू लिया लेकिन उसके पैर जमीन तक पहुँच न सके कारण सपने के पैर नहीं होते ! यथार्थ ने अपने पैर जमीन पर मजबूत गड़ाकर खड़ा हो गया जैसे की कोई पेड़ खड़ा हो, लेकिन ठूंठ की तरह पर हाथ आकाश तक पहुँच न सके क्योंकि यथार्थ के हाथ ही नहीं थे ! दोनों की ओर देखकर ब्रम्ह देव ने मुस्कुराते हुए कहा, कुछ समझ में आया तुम दोनों को ? 
सपना अकेला आकाश में अटक जाता है और यथार्थ अकेला जमीन पर भटक जाता है ! जब तक दोनों में मेल न हो जाए !
और मुझे इस कहानी से यही लगता है कि, सपने और यथार्थ का झगडा कभी मिटेगा नहीं! इसी सपने ने उत्तर प्रदेश में खंडहर हो चुके किले में एक हजार टन सोने के खजाने की खोज के लिए खुदाई का काम करवा दिया है ! मोदी जी ने सरकार के इस अभियान की धज्जिया उड़ाते हुए कहा कि, एक साधू के सपने के आधार पर खजाने की खुदाई से आज पूरी दुनिया में हमारा मजाक उड़ाया जा रहा है ! मुझे उनकी यह बात बहुत पसंद आयी ! यथार्थ परक बात यह थी कि, स्विट्जरलैंड के बैंकों में हिन्दुस्तान के चोर लुटेरों ने जो धन दबाकर रखा है वो एक हजार टन सोने से भी ज्यादा कीमती है किसी तरह उसे वापिस अपने देश लाया जाय तो कोई खजाना खोजने की जरुरत नहीं है ! उस सपने के तो न सर है न पैर है लेकिन इस यथार्थ का सच में सर भी है पैर भी है हम सब जानते है लेकिन काश लंबे हाथ भी होते ?? जो उस काले धन के खजाने तक पहुँच सके   … !! 

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

कही विद्रोह न कर दे नारी ….

मत पसारे हाथ अपने 
किसी के भी सामने 
दया के लिए वह 
चाहती हूँ  आज 
हर घर -घर में 
नारी सक्षम 
होनी ही चाहिए  
तभी ,
सही मायने में 
नवरात्रि  का उत्सव 
शक्ति की पूजा 
सार्थक कहलाएगी  !
लेकिन गाँव,कस्बों में 
आज भी 
विद्या से वंचित है 
सरस्वती 
पैसे -पैसे के लिए 
मोहताज है
 लक्ष्मी 
दुर्बल कितनी ही 
है  गौरी , दुर्गा 
सबके खाने पर 
बचा खुचा खाती है 
अन्नपूर्णा  आज भी ,
जानती हूँ उनका डर 
पढ़, लिखकर 
आत्मनिर्भर बन कर 
उनके नियमों के खिलाफ 
कही विद्रोह 
न कर दे  नारी   … 

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

गांधी जी के तीन बंदर …


२ अक्तूबर को महात्मा गांधी का जन्मदिन है ! प्रति वर्ष हम सब इस दिन को गांधी जयंती के रूप में मनाते है ! इस दिन को सारी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है ! गांधी जी के तीन बंदर हम सबको बहुमूल्य शिक्षा देते हुए पहला बंदर जिसने अपने हाथ आँखों पर रखे है, कहता है बुरा मत देखो ! दूसरा बंदर जिसने अपने हाथ कानों पर रखे है, कहता है बुरा मत सुनों ! तीसरा बंदर जिसने अपने हाथ मुंह पर रखे है, कहता है बुरा मत बोलो ! इन तीन बहुमूल्य सूत्रों को हमारे देश का बच्चा-बच्चा जानता है इसके बावजूद जिस अनुपात में इन दिनों बुराई बढ़ते ही जा रही है जो कि, हम सब अख़बारों में पढ़ रहे है हमारे आसपास देख रहे है यह हमारे लिए चिंता का और चिंतन का विषय है ! 

आदमी का जिस प्रकार पतन होता जा रहा है पशु भी शरमा जाय देखकर ! क्यों आदमी के आचार और विचार में भिन्नता आ गई है इन दिनों ? सभ्य, सुशिक्षित,सुसंस्कारी कहलाने वाला आदमी भीतर से इतना विक्षिप्त ? देखकर मानवता भी भयाक्रांत है ! लेकिन भयभीत होने से समस्याएं मिटती तो नहीं ! क्या हमने इन सूत्रों को विस्मृत कर दिया है ? या कही भूल हो रही है इन्हें सोचने में समझने में ? आईये इसी संदर्भ में ओशो का एक प्रवचन सुनते है ! अक्सर मेरा प्रयास यही रहता है कि कुछ नया आप सबको सुनाऊ ताकि आप सबको एक नए दृष्टिकोण से परिचित करा सकूँ !

ओशो से किसी मित्र का प्रश्न है  यह बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो,बुरा मत बोलो, इन तीन सूत्रों के संबंध में 
आपका क्या कहना है ?
ओशो कहते है    … सूत्र तो जिंदगी में एक ही है   … बुरे मत होओ ! ये तीन सूत्र तो बहुत बाहरी है ! भीतरी सूत्र तो बुरे मत होओ वही है ! और अगर कोई भीतर बुरा है, और बुरे को न सुने, तो कोई अंतर नहीं पड़ता ! और अगर कोई भीतर बुरा है और बुरे को न बोले, तो कोई अंतर नहीं पड़ता ! ऐसा आदमी सिर्फ पागल हो जायेगा ! क्योंकि भीतर बुरा होगा ! अगर बुरे को देख लेता तो थोड़ी राहत मिलती वह भी नहीं मिलेगी ! अगर बुरे को बोल लेता तो थोडा बाहर निकल जाता, भीतर थोडा कम हो जाता, वह भी नहीं होगा ! अगर बुरे को सुन लेता तो भी तृप्ति मिलती, वह भी नहीं हो सकेगी ! भीतर बुरा अतृप्त रह जाएगा ! नहीं, असली सवाल यह नहीं है ! लेकिन आदमी हमेशा बाहर की तरफ से सोचता है !

असली सवाल है होने का, असली सवाल करने का नहीं है ! मै क्या हूँ, यह सवाल है ! मै क्या करता हूँ, यह गौण है ! भीतर मनुष्य क्या है, उससे करना निकलता है ! हम जैसे है वही हमसे किया जाता है ! लेकिन हम चाहे तो धोखा दे सकते है ! बुराई भीतर दबाई जा सकती है ! दबाई हुई बुराई दुगुनी हो जाती है !

मै यह नहीं कह रहा हूँ कि बुरा करें ! मै यह कह रहा हूँ,बुराई को दबाने से बुराई से मुक्त नहीं हुआ जा सकता ! बुरे होने को ही रूपांतरित होना है ! इसलिए सूत्र तो एक है कि बुरे न हों ! लेकिन बुरे कैसे न होंगे, बुरे हम है ! इसलिए इस बुरे होने को जानना पड़े, पहचानना पड़े ! यही मै कह रहा हूँ कि यदि हम अपनी बुराई को पूरी तरह जान ले तो बुराई के बाहर छलांग लग सकती है !

लेकिन हम बुराई को जान ही नहीं पाते,क्योंकि हम तो यह सोचते है कि बुराई कही बाहर से आ रही है ! बुरे को देखेंगे तो बुरे हो जायेंगे,बुरे को सुनेंगे तो बुरे हो जायेंगे, बुरे को बोलेंगे तो बुरे हो जायेंगे ! हम तो यह सोचते है कि बुराई जैसे कही बाहर से भीतर की तरफ आ रही है ! हम तो अच्छे है, बुराई कैसे बाहर से आ रही है ! यह धोखा है बुराई बाहर से नहीं आती बुराई भीतर है ! भीतर से बाहर की तरफ जाती है बुराई ! गुलाब में कांटे बाहर से नहीं आते, भीतर की तरफ से आते है ! फूल भी भीतर की तरफ से आता है, वह भी बाहर से नहीं आता ! भलाई भी भीतर से आती है, बुराई भी भीतर से आती है, कांटे भी भीतर से फूल भी भीतर से !

इसलिए बहुत महत्वपूर्ण यह जानना है कि भीतर मै क्या हूँ ? वहां जो मै हूँ, उसकी पहचान ही परिवर्तन लाती है, क्रांति लाती है ! लेकिन शिक्षाएं ऐसी ही बाते सिखाए चली जाती है ! वे बहुत उपरी है, बहुत बाहरी है ! इसलिए सारी शिक्षाओं ने मिल कर ज्यादा से ज्यादा आदमी के आवरण को बदला है, उसके अंतस को नहीं ! और आवरण बदल जाए इससे क्या होता है ? सवाल तो अंतस के बदलने का है ! आवरण सुन्दर हो जाए तो भी क्या होता है ? सवाल तो अंतस के सुंदर होने का है !

हाँ, एक कठिनाई हो सकती है कि आवरण सुंदर बनाया जा सकता है और अंतस कुरूप रह जाए, तो आदमी दो हिस्सों में बंट जाए, असली आदमी भीतर हो, नकली आदमी बाहर हो ! जैसा कि है एक आदमी है नकली,जो हम बाहर होते है, और एक आदमी है असली ,जो हम भीतर होते है ! वह जो भीतर है वही है ! और अगर कही कोई परमात्मा है तो उसके सामने जब हम खड़े होंगे तो वह जो भीतर है वही दिखाई पड़ेगा ! वह जो नकली है वह छूट जायेगा, वह साथ नहीं होगा !

इसलिए कोई क्रांति करनी है तो आचरण में करने की उतनी चिंता मत करना, अंतस में करना, क्योंकि अंतस से आचरण आता है ! लेकिन समझाया कुछ ऐसा जाता है कि जैसे आचरण ही अंतस है ! तब आदमी आचरण को ही बदलने में लग जाता है ! आचरण बदल भी जाए तो भी अंतस नहीं बदलता ! अंतस बदले तो ही आचरण बदलता है !

मै सुबह कह रहा था कि , अगर कोई गेहूं बोए तो भूसा भी पैदा हो जाता है ! गेहूं तो अंतस है, भूसा आचरण है, बाहर है ! लेकिन अगर कोई भूसे को बोने लगे,तो गेहूं तो पैदा होता नहीं, भूसा भी सड जाता है ! गेहूं बोना चाहिए, तो भूसा भी आ जाता है बिना बोए ! और भूसा बोया, तो गेहूं तो आता ही नहीं, भूसा सड जाता है ! आचरण भूसा है, अंतस आत्मा है !
                                     इसलिए सूत्र एक है     … बुरे मत होओ !

लेकिन बुरे हम है ,मत होओ कहने से क्या होगा ? बुरे मत होओ, इसका अर्थ हुआ कि जो हम है बुरे उसे जाने, पहचाने ! इतना तय है कि कोई आदमी अपनी बुराई को पहचान ले तो बुरा नहीं रह जाता, बुरा होना असंभव है ! न मालुम कितने हत्यारों ने अदालत में इस बात की स्वीकृति की है कि हम हत्या होश में नहीं किये है ! हम बेहोश थे तब हो गई यह बात ! और कुछ हत्यारों ने तो यह भी कहा है कि उन्हें स्मरण ही नहीं है उन्होंने हत्या कब की ! तो पहले समझा जाता था कि वे झूठ बोल रहे है ! लेकिन अब मनोविज्ञान उनकी स्मृति की खोजबीन करके कहते है कि वे ठीक बोल रहे है ,उनको पता ही नहीं उन्होंने इतने बेहोश हो गए क्रोध में कि हत्या कर गए, वह उनकी स्मृति ही नहीं बनी, जब वे होश में आये तब हत्या हो चुकी थी ! जो गहरे में जानते है, वे कहते है, आदमी बुराई करता है सदा बेहोशी में ! कोई भी आदमी बुराई को होश में नहीं करता, नहीं कर सकता ! इसलिए असली सवाल  है बेहोशी तोड़ने का है !

( नये समाज की खोज, से साभार प्रवचन -४ )

बुधवार, 25 सितंबर 2013

आज मॉर्निंग वाक पर !

इन दिनों सतीश जी का लिखने का उत्साह देखकर कितना अच्छा लगता है न एक मन ने कहा , एक के बाद एक नायाब शेर लिख मार रहे है ! और ताऊ जी  हर दुसरे दिन एक पोस्ट लिखने वाले पता नहीं इन दिनों कहाँ ग़ायब से हो गए है लगभग तीन हफ्ते से एक भी नई पोस्ट नहीं आयी उनकी !ब्लोगिंग के अलावा भी कितने सारे काम होते है किसी काम में व्यस्त होंगे दुसरे मन ने कहा  ! रश्मि प्रभा जी ने भी लिखना कितना कम कर दिया है ! संगीता जी भी पंधरा दिन को एक पोस्ट लिखती है ! रमण जी तो महीने में कभी एखाद पोस्ट डालते है अपने ब्लॉग पर, कुछ मित्रों की वजह से जो रौनक दिखाई देती है हमारे ब्लॉग जगत में पता नहीं क्यों आजकल कुछ सुना -सुना सा लग रहा है टहलते टहलते अचानक मेरे इन विचारों को ब्रेक सा लगता है, मेरे बाजू से जीतनी तेजी से मिसेज वर्मा और मिसेज शर्मा वाकिंग करते  हुए गुजर रही थी उतनी ही तेजी से आपस में टॉकिंग कर रही थी न चाहते हुए भी उनकी बाते मेरे कान में पड़ ही गई  … !

 मिसेज वर्मा मिसेज शर्मा से पूछ रही थी जो की दोनों अच्छी दोस्त भी है   । "लगता है आज अकेली ही आयी हो ? शर्मा जी नहीं आए टहलने क्या बात है ? पता नहीं तुम वर्मा जी को रोज सुबह टहलने कैसे ले आती हो ? मुझे इनको जगाने में बड़ी दिक्कत होती है "! सहेली की बात सुनकर वर्मा साहब की मिसेज ने कहा  … "वो भी कहाँ अपने आप जागते है मुझे जबरदस्ती जगा कर लाना पड़ता है आखिर घर के साथ साथ मुझे उनकी बढती तोंद का भी ख्याल रखना पड़ता है "! मै तो रोज सुबह उनको जगाने के लिए एक तरकीब अपनाती हूँ क्यों न तुम भी वह तरकीब अपनाओ ! कौन सी तरकीब ?सहेली ने पूछा ! मेरी जो पालतू बिल्ली है न मै उस बिल्ली को मजे से सो रहे अपने पति पर फेक देती हूँ ! लेकिन बिल्ली फेकने से कैसे कोई उठता है ?सहेली का मासूम सा प्रश्न सुन कर वर्मा साहब की मिसेज ने कहा   "उठना ही पड़ता है,क्योंकि वो अपने कुत्ते के साथ सोते है उनके कुत्ते और मेरी बिल्ली में जब घमासान युद्ध छिड़ता है अपने आप उठ कर टहलने आ जाते है बड़ा लाभदायक तरीका है आजमा कर देख लेना कल "! 

फिर उनकी बाते मेरे कान की पहुँच से बहुत दूर होती गई      ….! क्या मिसेज शर्मा  अपने सहेली की बतायी हुयी तरकीब अपनायेंगी कल ? क्या मॉर्निंग वाक् पर शर्मा जी टहलने आ जायेंगे ? आपके साथ साथ मुझे भी उत्सुकता है कल के सुबह की  … !

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

ताजी चौकाने वाली खबर यह भी है …

दिन जो की 
कल भी वही था 
आज भी वही है 
जो कल आयी थी 
वही तो सुबह है !
हाथ में फीकी 
चाय की प्याली 
साथ में अख़बार 
अख़बार में वही 
बासी खबरे है !
भ्रष्टाचार,कालाबाजारी 
भ्रष्ट अफसर बेईमान नेता 
बाबाओं के वही सब 
काले चिट्टे कारनामे है !
नई सुबह में ऐसी 
क्या खास बात है ?
आम आदमी को प्याज 
कल भी रुलाता था 
आज भी रुला रहा है 
महिलाओं पर अत्याचार 
कल भी होते थे 
आज भी हो रहे है  !
ज्योति बुझाने वालों को 
क्या हक़ बनता है 
उजालों में रहने का ?
नाबालिग अपराधी को 
तीन साल की सजा ?
इस फैसले के दुसरे 
या तीसरे दिन से ही 
नाबालिग बलात्कारियों की 
संख्या में अचानक वृद्धि 
हुई है !
बासी ख़बरों के साथ-साथ 
आज की ताज़ी चौंकाने वाली 
खबर यह भी है  … !!

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हमारे त्योहार …

इस बार गणेश चतुर्थी पर मेरा बेटा पुणे से हैदराबाद चार दिनों के लिए घर आया हुआ था ! महीनों हुए थे उसे देखे हुए अचानक शुक्रवार की सुबह सुबह उसे सामने देखकर मन में जो भाव थे बता नहीं सकती, आने की बिना खबर दिए अच्छा सरप्राईज दिया उसने हम सबको यहाँ आकर ! घर,परिवार,रिश्तेदार, गणेश चतुर्थी का त्यौहार इन सबके बीच काफी व्यस्त रही मै इन दिनों, न कुछ पढ़ना हुआ न कुछ लिखना हुआ नेट से दूर  … बस अपनों के बीच सबके साथ हँसते खेलते समय कैसे तेजी से बीत गया पता ही न चला ! सबकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना एक गृहिणी के लिए बड़ा  मुश्किल काम होता है, खैर कल ही सभी रिश्तेदार अपने अपने घर चले गए है, बेटा वापिस पुणे अपने जॉब पर, आज से फिर मेरा अपना रूटीन शुरू हुआ है !

आप सबके क्या हाल चाल है ? आप भी त्यौहार के मजे ले रहे होंगे है न ? हमारे शहर में तो भगवान गणेश की पूजा अर्चना के साथ दस दिवसीय गणेशोत्सव प्रारंभ भी हो चूका है ! हर गली मुहल्लों ,सड़कों चौराहों पर विभिन्न आकार, प्रकार के गणेश प्रतिमाएं स्थापित कर भक्तगण विधिपूर्वक पूजा अर्चना कर रहे है ! घर-घर में मेरी जैसी गृहिणियां गणेश जी का मनपसंद भोजन "मोदक" बना रही है ! शहर के पंडालों में मै बड़ा की तू बड़ा कहते हुए जैसे होड़ सी लगी है इन गणेश जी की प्रतिमाओं में, क्यों न हो जिस गली का जितना अधिक चंदा उतने बडे गणपति बप्पा विराजमान हुए है ! पंडालों में पूजा अर्चना और प्रसाद वितरण के बाद  बच्चे,बड़े,बूढ़े सभी झूम रहे है नाच रहे है  " oppa gangnam style "  पर, मूषक पर सवार गणपति बप्पा भी खुश हो रहे है अपने भक्तों को झुमते हुए देख कर ! कुल मिलाकर हमारा हैदराबाद शहर इन दिनों भक्ति रस में डूबा हुआ है !दस दिवसीय गणेशोत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जायेगा हमेशा की तरह और फिर विसर्जन !

जीवन के शोक,चिंता और दुखों को भुलाकर मनुष्य अपनों के साथ बैठकर कुछ पल मुस्कुरा सके, हंस बोल सके इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर हमारे त्योहार बने होंगे ! हर त्यौहार अपने-अपने  ऐतिहासिक,सामाजिक,धार्मिक महत्व को दर्शाते है जिससे हमारी संस्कृति को समझा जा सके लेकिन आज कल हर त्योहार उसके पीछे की जो भावना रही होगी उसे विस्मृत कर सिर्फ मौज,मस्ती और दिखावे भर के रह गए है आपको क्या लगता है ?

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

"फ्रेश फिश सोल्ड हियर "

मै ये हूँ, मै वो हूँ, उसकी कार से मेरी कार महँगी और बड़ी है, उसके बंगले से मेरा बंगला बड़ा है,उसके मठ से मेरा मठ बड़ा है, उसके चेलों से मेंरे चेले अधिक है, … हम हमारे चारो ओर इसी फाल्स इगो का प्रसार प्रचार होता हुआ अक्सर देखते है ! क्या कभी किसी ने इस मै मै कहने वाले इगो को कभी देखा है ? काश हम इस इगो को समझ पाते खोज पाते,जो भीतर कही है ही नहीं, हम भी उस दुकानदार की तरह सारी तख्तियां निकाल फेंकते जो की केवल दुकाने चलाने के लिए हमारे स्वभाव पर हमने लटकाई हुई है, जिससे हमारा वास्तविक स्वभाव ढक सा गया है ! क्यों न हम उस कहानी को ही सुने जिससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो  ! 

एक गांव में एक आदमी ने मछलियों की एक दुकान खोली, उस गांव में यह पहली ही दुकान थी इसलिए दुकानदार ने बहुत सुन्दर तख्ती बनवाई और उसपर लिखवाया कि, "फ्रेश फिश सोल्ड हियर" अर्थात यहाँ ताजी मछलियां बेचीं जाती है ! पहले दिन पहला ग्राहक आया और उसने उस तख्ती को देखकर कहा  … "फ्रेश फिश सोल्ड हियर " ? कही बासी मछलियां भी बेचीं जाती है ? ताज़ी लिखने की क्या जरुरत है ? दुकानदार ने सोचा ग्राहक ठीक ही तो कह रहा है सो उसने "फ्रेश"शब्द तख्ती से हटा दिया अब रह गया था सिर्फ "फिश सोल्ड हियर" याने की मछलियाँ बेचीं जाती है ! फिर दुसरे दिन एक बूढी औरत आयी और उसने उस तख्ती को देखकर कहा "फिश सोल्ड हियर" ? यहाँ नहीं तो कही और भी मछलियाँ बेचते हो क्या ? उस दुकानदार ने सोचा बूढी औरत सच ही तो कह रही है "हियर" शब्द बिलकुल बेकार है सो उसने उस शब्द को हटाकर केवल तख्ती पर लिख दिया "फिश सोल्ड" ! फिर तीसरे दिन एक आदमी ने उस तख्ती को देखकर कहा "फिश सोल्ड" का क्या मतलब है भाई, मुफ्त भी देते हो क्या  ? उस दुकानदार को लगा यह आदमी भी सच कह रहा है सोल्ड शब्द भी बेकार है सो उसने उसे भी हटा दिया अब सिर्फ उस तख्ती पर रह गया "फिश" ! 

अगले दिन एक बुढा व्यक्ति आया उसने उस तख्ती को देखकर कहा  …  "फिश"? अरे भाई किसी अंधे को भी दूर से ही पता चलता है कि,दुकान में मछलियाँ है दूर से ही इनकी बास जो आ रही है फिर फिश लिखने की क्या जरुरत है ? दुकानदार को लगा यह व्यक्ति भी सही कह रहा है सच में मछलियों की गंध से ही पता चलता है फिश लिखने की कोई जरुरत नहीं है सो उसने फिश शब्द को भी निकाल दिया ! अब सिर्फ दुकान पर खाली तख्ती लटकी हुई थी !
फिर अगले दिन और एक आदमी आ गया उसने उस खाली तख्ती को देखकर कहा   "क्यों भाई व्यर्थ की खाली तख्ती लटकाई है ? इस तख्ती से दुकान पर आड़ पड रही है " और उसके बाद उस दुकानदार ने उस तख्ती को भी निकाल कर फ़ेंक दिया ! एक एक करके हर व्यर्थ चीज हटती चली गई अंत में बच गया था केवल खाली स्पेस,केवल शून्य जो की हमारा स्वभाव है लेकिन हमने न जाने इस प्रकार की कितनी ही मै,मै की तख्तियां उस स्वभाव पर लटकाई 
हुई है !