"सो जाओगे तो मर जाओगे" ....यह मै नहीं कह रही हूँ अख़बार की दिलचस्प खबर कह रही है ! दरअसल सो जाओगे तो मर जाओगे वाली अफवाह ने लोगों की नींद हराम की हुई है ! जितनी जुबानी उतनी बाते उतनी ही कहानियाँ ! सेलफोन के जरिये लोग बिना सोच विचार किये इस अफवाह को एक दुसरे तक पहुंचा रहे है ! महाराष्ट्र के जिले अहमदनगर,लातूर,बीड, परभनी आदि शहरों में लगभग रात के बारह बजे के आस पास लोग एक दुसरे को फोन पर यह सुचना दे रहे है कि, भूकंम्प आने वाला है ! लोग दुसरे शहरों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को फ़ोन कर रहे है ! इस तरह खुद जग रहे है और दूसरों को जगा रहे है ! अचानक किसी ने यह अफवाह फैलाई कि, एक प्रसूति गृह में एक नवजात बालिका ने कहा क़ी जो आज रात सोयेगा वह मर जायेगा ! यह अफवाह फैलते -फैलते हमारे शहर हैदराबाद तक पहुँच गई है ! यहा कुछ जगहों पर जगराता वाला माहोल है ! महाराष्ट्र में रहने वाली मेरी दोस्त ने मुझे कल रात फोन किया ! सारी बाते सुनने के बाद मैंने कहा कि,...इन बेकार क़ी अफवाओं पर ध्यान मत दे ! भूकंम्प से मरोगे क़ी नहीं यह मुझे पता नहीं पर बिना नींद के जरुर मरोगी मैंने कुछ नाराजगी से कहा ! लेकिन ये अफवाहे कौन फैला रहा होगा उसने कुछ चिंतित स्वर में कहा ...! अब ये तो कोई लाल बुझक्कड़ ही बता सकता है...मैंने खीजते हुये कहा ! क्यों बेतुका सा जवाब दे रही हो उसने कहा ! बेतुके सवाल के बेतुका ही जवाब होगा ना मैंने कहा .... लाल बुझक्कड़ कौन है ? उसने मासुम-सा सवाल किया ! फालतु के सवाल मत कर फ़ोन रख दे मुझे नींद आ रही मैंने उनींदी आँखों से जम्हाई लेते हुये कहा और फोन रख दिया ! जानती हूँ उसको दुःख हुआ होगा लेकिन मै भी क्या करूँ इतनी पढ़ी लिखी होकर बेकार क़ी अफवाओं पर विश्वास करती है ! पता नहीं कौनसे शताब्दी में रहते है लोग ! आपके मन में भी रोचकता जगी होगी न कि, यह लाल बुझक्कड़ कौन है ? क्यों न मै उसका एक किस्सा ही सुनाउ आपको, आईये सुनते है ...लाल बुझक्कड़ शर्लक होम्स से कम थोड़े ही है (ऐसा मै नहीं खुद लाल बुझक्कड़ का और उन गांववालों का मानना है ) किस्सा कुछ यूँ हुआ था एक बार उस गांव में चोरी हो गई ! बहुत लोगों ने खोजबीन क़ी पर चोर का पता नहीं चला ! पुलिस आई पर उनको भी कुछ पता नहीं चला चोर का ! आखिर गांव वालों ने पुलिस इन्स्पेक्टर से कहा कि,"हमारे गांव में लाल बुझक्कड़ रहता है वो हर मसले को चुटकियों में बुझ देता है "! बहुत पहुंचे हुये ज्ञानी है हमारे लाल बुझक्कड़ ....एक दफा ऐसा हुआ कि ,गांव से हाथी नीकल गया था ! (गांव वालों ने हाथी देखा हुआ नहीं था कभी ) रात हाथी गांव से निकला और सुबह उसके पैरों के निशान दिखाई दिए ! सारे गांव में चिंता की लहर फैल गई कि .किसके पैर के निशान हो सकते है इतने बड़े बड़े ? पैर के निशान इतने बड़े है तो फिर वो जानवर कितना बड़ा होगा ? फिर लाल बुझक्कड़ ने सुझा दिया कि, घबराने क़ी बात नहीं है ....सीधी सी बात है जरुर हरिण रहा होगा ! उस हरिण ने ही अपने पैरों में चक्की बांध कर उछला होगा ! इस प्रकार लाल बुझक्कड़ ने मसले का हल कर दिया, कहकर गांव वालों ने पुलिस इन्स्पेक्टर को बता दिया ! इन्स्पेक्टर ने कहा यह भी ठीक है चलो देखते है शायद लाल बुझक्कड़ चोर का पता बता दे पूछते है ! लाल बुझक्कड़ को बुलाया गया ! उसने कहा चोर के बारे में बता तो सकता हूँ पर सबके सामने नहीं बताऊंगा ! क्योंकि मै कोई झंझट मोल नहीं लेना चाहता ! चलिए किसी एकांत स्थान पर चलते है वही बताऊंगा पर, कसम खाओ क़ि, किसी को बताओगे तो नहीं ? "पुलिस इन्स्पेक्टर ने स्वीकृति दी क़ि किसी को नहीं बताऊंगा कसम खाता हूँ मगर तुम बता तो दो भैय्या "! पुलिस इन्स्पेक्टर को लेकर लाल बुझक्कड़ बहुत दूर जंगल में ले गया ! बहुत दूर जाने के बाद इन्स्पेक्टर ने कहा ..."अब तो बता दो यहाँ तो कोई भी नहीं है पशु पक्षी तक नहीं है सुनने को " तब लाल बुझक्कड़ ने इन्स्पेक्टर के कान में फुसफुसाकर कहा क़ि, मुझे पक्का यकीन है देखो किसीको कहना मत चोरी किसी चोर ने क़ी है !
शुक्रवार, 24 अगस्त 2012
बुधवार, 22 अगस्त 2012
क्रोध का रूपांतरण ......
कल किसी कारणवश बाहर जा रही थी ! सड़क के चौराहे पर ग्रीन सिग्नल मिलते ही वाहनों का काफिला चल पड़ा ! इतने में एक कार ने दूसरी कार को धक्का मारा ! जरासा धक्का क्या लगा कि,गाडी में बैठे दोनों युवक अपनी अपनी कार से उतर पड़े और वही हुआ जो होना था तू-तू मै-मै से लेकर गालियों से लेकर मार-पिट तक मामला चला ! ट्राफिक जैम हुआ लोग उतर कर तमाशा देखने लगे ! तमाशा देखने वालों क़ी कमी थोड़े ही है दुनिया में ? कुछ लोगों को हिंसा फैलाने में मजा आता है तो कुछ को देखने में ! कारण चाहे छोटे हो या बड़े हो लेकिन हर मनुष्य क्रोध से जैसे उबल रहा है ! सुबह उठकर कोई भी समाचार पत्रिका उठाकर देखिये ज्यादातर खबरे अपराध, हिंसा से भरी पड़ी है ! हम जिसे प्रगतिशील युग कह रहे है आज के इस युग पर नजर डालिए तो, हर छोटे-बड़े शहरों में हिंसा हो रही है ! कुछ दिन पूर्व पुणे में एक के बाद एक बम ब्लास्ट हो, या फिर हाल ही में अमेरिका में हुये गुरुद्वारे में निर्दोष लोगों क़ी मारे जाने खबर, थियेटर में जेम्स द्वारा अंधाधुन्द गोलिया चलाकर कई मासूम लोगों क़ी जान लेने क़ी खबर ! इस प्रकार क़ी हिंसा करने वाले विक्षिप्त अपराधियों को यह पता नहीं क़ि कौन मरा है और कितने मरे है ! उन्हें तो बस अपना क्रोध प्रकट करना है ! हर रोज सारे विश्व में होने वाली इन घटनाओं पर हम अपनी-अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार सोचते है तर्क देते है क़ि, इन हिंसाओं के पीछे कारण क्या है ? दूषित माहोल? आधुनिक शिक्षा ? अच्छी परवरिश की कमी ? मानसिक असंतुलन ....बहुत हद तक ये सब बाते सही होते हुये भी क्रोध का बुनियादी कारण है ध्यान का अभाव! सनातन काल से हमारे बुद्ध पुरुष ध्यान क़ी देशना देते आ रहे है ! महावीर क़ी करूणा हो चाहे बुद्ध क़ी अहिंसा हो किसी क़ी थोपी हुई नहीं बल्कि ध्यान के सूत्रों पर आधारित है ! हमेशा हिंसा क़ी ओर प्रेरित करने वाली क्रोध क़ी उर्जा को ध्यान से रूपांतरित किया जा सकता है ! हिंसक अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा देकर कानून यह सोचता हो क़ि, अपराध कम होंगे हिंसा कम होगी लेकिन यह कभी हुआ था न कभी होगा ! इसका मतलब यह नहीं क़ि अपराधियों को खुला छोड़ दे ! लेकिन एक बड़े पैमाने पर आज मनुष्य को ध्यान याने मेडिटेशन क़ी जरुरत है !
शुक्रवार, 10 अगस्त 2012
हे कृष्ण...
हे कृष्ण,
इनके कहने पर आज
तुम्हारे मंदिर में आई हूँ
तुम्हारे चरणों पर चढाने
कुछ ताजे फूल लाई हूँ
मंदिर में बढती भीड़
और इस भीड़ में
क्या दम तुम्हारा
घुटता नहीं ?
दूध,घी,तेल से
नहलाने पर देह तुम्हारी
चिपचिपी होती नहीं ?
सदियों से बांसी प्रार्थनायें
सुन-सुनकर उबता नहीं
मन तुम्हारा ?
ऐसे में हे कृष्ण,
कैसे खड़े रह सकते हो
पाँव पर पाँव धरे हुये
होंटों पर पथराई-सी
मुस्कुराहट और बांसुरी
लिये हुये !
बस इतनी सी कृपा कर दो
स्विस बैंक में कबसे बंद पड़ी
लक्ष्मी जी को मुक्त कर दो
ताकि हम सब यह यकीं
कर ले क़ि, तुम हो
यहीं कहीं हो ......
शुक्रवार, 3 अगस्त 2012
एक कविता को छोड़कर .....
कभी-कभी जीवन में किसी बहुत ही निकट स्नेहीजन की मृत्यु पर व्यक्ति का मन बहुत गहरे तक पीड़ा से आहत हो जाता है ! दुःख के इस आघात से कई बार जीवन अर्थहीन व्यर्थ सा लगने लगता है ! जीवन सबंधी कुछ बुनियादी प्रश्न मन को झकझोरने लगते है ! पल में सुख तो पल में दुःख जीवन की ये कैसी पहेली है ? जीवन और मृत्यु का क्या रहस्य है ? कौन हूँ मै ? मेरे होने का क्या प्रयोजन है ? ऐसे कई सवाल मनुष्य को जीवन को जानने संबंधी जिज्ञासा से भर देते है ! और यही जिज्ञासा जीवन क़ी गहरी खोज तक ले जाती है !
हमने जीवन को
कब समझा कब जाना
यूँ ही जीवन को व्यर्थ गँवाया
किन्तु जीते-जीते
एक दिन पता चला
जिसको हमने जीवन समझा
वह जीवन नहीं
मृत्यु के द्वार पर
खड़ी हुई मनुष्य की
लंबी कतारे है
कोई आज गया कोई
कल कोई परसों जायेगा
देर सवेर की बात है
खोजने पर भी उनके
नहीं मिलेंगे निशान
जैसे पानी पर खींची
गई हो लकीरें
बन भी नहीं पाती
कि मिट जाती है
ऐसे ही पल में सब कुछ
मिटा देती है मृत्यु
एक कविता को छोड़कर .......
सोमवार, 30 जुलाई 2012
बहन भाई के प्यार की परिभाषा .....
सह शिक्षा ने हमारी लड़कियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर दिये है ! अपने भाइयों के मुकाबले किसी भी बात में कमतर नहीं है आज की लड़कियाँ ! पढ़लिख कर आत्मनिर्भर बन रही है इतना ही नहीं, अपने भाइयों की अपेक्षा ज्यादा जिम्मेदार बनकर माता-पिता का सहारा भी बन रही है ! सुबह से लेकर देर रात हर क्षेत्र मे यहाँ तक की मल्टी नेशनल कम्पनियों में भी बखूबी अपना योगदान दे रही है ! वह जमाना अब बीत गया है कभी वह बेटी बनकर पिता के संरक्षण में, पत्नी बनकर पति के संरक्षण में और बुढ़ापे में बेटे के संरक्षण में अपना जीवन बिताती रही है ! आज वह किसी की दया की पात्र नहीं खुद कमाती है मनमुताबिक खर्च करती है अपना हर छोटा बड़ा फैसला खुद करती है ! आज के माता-पिता भले ही अपने बच्चों में कोई फर्क नहीं करते पर जब बहन के हक्क की बात आती है तो, बहन भाई के प्यार भरे रिश्ते में खटास आ ही जाती है ! अभी भी अनेक परिवारों में पैतृक संम्पत्ति पर भाई अपना एकाधिकार समझता है ! अगर गलतीसे बहन अपना हक्क मांगती है तो भाई को बुरा लगता है ! पैतृक संपत्ति को लेकर जब विवाद होता है तो पहले वाला स्नेह, प्यार पल भर में गायब हो जाता है ! कानून ने भले ही दोनों को पैतृक संम्पत्ति पर समान अधिकार दिए हो लेकिन भाइयों को बिलकुल बर्दाश नहीं होता कि, बहने अपना हक्क मांगे ! इसे ध्यान में रखकर माता-पिता को चाहिए कि, अपने जीते जी संपत्ति का समान बंटवारा अपने बच्चों में विल के जरिये कर दे ताकि, आगे चलकर कोई विवाद न हो ! कुछ समाज में आज भी परंपराओं के नाम पर घर कि इज्जत के नाम पर ऑनर किलींग जैसा भयानक रोग उग्र रूप धारण कर रहा है ! ज्यादातर लड़कियों की हत्या उनके भाइयों ने क़ी हुई है ! जिन बहनों ने रक्षा हेतु अपने भाइयों क़ी कलाई पर राखी बांधी होगी वही हाथ अपने बहनों क़ी हत्या करते हुए एक क्षण भी नहीं काँपे होंगे आश्चर्य होता है ! परंपराएँ व्यक्ति के जीवन से ज्यादा नहीं हो सकती ! समय के साथ बदलाव आने चाहिए और उसे स्वीकार करने क़ी मानसिकता हर मनुष्य में होनी चाहिए !
रक्षाबंधन सिर्फ एक दिन भाई क़ी कलाई पर राखी बांधने और प्रेम जताने का पर्व नहीं है ! आज के दिन हर बहन अपने निस्वार्थ मन से अपने भाई के यश क़ी मंगल कामना करे, और हर भाई यह प्रण करे क़ि, अपने बहन को हर वो ख़ुशी हर वो अधिकार दूंगा जिसकी वह हक्कदार है ! तभी सही मायने में रक्षाबंधन का यह त्यौहार सार्थक होगा ! जाते-जाते एक़ प्यारी सी बात .........." सात वर्ष क़ी बहन ने अपने नऊ वर्षीय भाई से कहा ....भैय्या प्यार क्या होता है ? तो भाई ने कहा ....जब तुम मेरे स्कुल बैग से चॉकलेट नीकाल लेती हो, तब मै उस जगह दूसरी चॉकलेट रखता हूँ इसी को प्यार कहते है "! भाई-बहन के प्यार क़ी परिभाषा इससे सुंदर और कोई हो सकती है क्या भला ? सोचकर बताना .....
बुधवार, 25 जुलाई 2012
"यत्र नारी पूज्यंते" ...
मैंने कही पढ़ा था कि, जब इंदिरा गांधी भारत कि प्रधान मंत्री थी तब गोल्डामेयर (Golda Meir ) इजरायल क़ी प्रधानमंत्री थी ! हुआ यूँ क़ी इंदिरा जी एक बार इजरायल गई हुई थी ! दोनों के बीच बातों के दौरान उन्होंने गोल्डा मेयर से कहा कि, और सभी चीजे दिखाई लेकिन यहूदी मंदिर नहीं दिखाया ? गोल्डा मायर थोड़ी सकुचाई कि, कैसे यह बात कहे कि यहूदी मंदिर में स्त्रियों को प्रवेश नहीं है ! एक छज्जा दूर ...ऊपर उनके लिये अलग से बनाया है ! मगर जब इंदिरा जी ने जोर दिया देखने के लिये तो गोल्डा मेयर लेकर गई उन्हें, दोनों छज्जे पर बैठी ! इंदिरा जी जब वापस लौटी तो दिल्ली में किसी ने उनसे पूछा क़ी कुछ खास चीजे वहाँ पर देखी ? तो इंदिरा जी ने जवाब दिया और सब तो देखा ही देखा है पर खास बात यह देखी कि, इजरायल में प्रधान मंत्री छज्जों पर बैठ कर प्रार्थना करते है मंदिर में नहीं ! इंदिरा जी ने समझा होगा कि, इस प्रकार का आयोजन प्रधान मंत्रियों के लिये खास किया जाता होगा ! लेकिन यह आयोजन स्त्रियों को मंदिर में जाने से रोकने का उपाय था !
इतिहास के पन्ने पलटकर देखे तो पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं कि स्थिति कभी बेहतर नहीं थी ! उसके साथ परिवार वालों ने, समाज ने हमेशा भेद भाव वाला रवैय्या अपनाया है ! कुछ महान कवियों ने उसकी प्रशंसा में कविता, गीत लिखे तो कहीं पर "यत्र नारी पूज्यन्ते " जैसे महान सूत्रों का हमारे शास्त्रों में समावेश किया है! साथ ही साथ कुछ असम्मान जनक बाते भी लिखी है संदर्भ जो भी रहा हो ! जिन्होंने भी ऐसा लिखा होगा मै तो कहती हूँ ...स्त्री से भयभीत रहा होगा या फिर स्त्री को समझ ही नहीं पाया होगा ! अगर स्त्रियों ने शास्त्र लिखे होते तो स्थति उलट होती, लिखना तो दूर कि बात स्त्रियों को पुरुषोने शास्त्र पुरानों को पढने तक नहीं दिया !
धीरे-धीरे ही सही आज परिस्थिति बदल रही है !स्त्री को अपनी स्थिति का भान होने लगा है ! पुरुषों से समान हक्क पाने का उसका सपना साकार होने लगा है !बस एक बात कहना चाहती हूँ ....कमसे कम अपने परिवार और देश क़ी सामाजिक सांस्कृतिक उत्थान के लिये महिलाओं के प्रति अशोभनीय व्यवहार में सूधार होना अत्यन्त जरुरी है !
सोमवार, 16 जुलाई 2012
मन रिक्त न रह ....
रात भर
हुई वर्षा
बारिश में
पेड़-पौधे
भीगे
पंछियों के
पंख भीगे
नीड़ में,
चारो ओर
बारिश के
नैसर्गिक आनंद में
हुलसे मानव,
वन-उपवन !
मत झिझक
तू भी हठी
शिकायती मन
रिक्त न रह
भर भावों की
गागर
भाव सरिता में
तू भी उन्मुक्त
भीग !
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