बुधवार, 2 नवंबर 2016

बह गया कवि ...

तम की विकट
निशा बीती !
सुहानी भोर में
सूरज की सुनहरी
धुप निकली !
अहम पिघला
गर्माहट से,
भावों की बाढ़
आ गई !
बाढ़ में,
बह गया कवि !
हाथ में धरी
चाय की प्याली
रह गई
धरी की धरी ... !

4 टिप्‍पणियां:

  1. कवी कहाँ बहता है ... उसकी सोच कहीं नहीं बहती ... कमजोर हो जाती है पर कुंद नहीं होती ... गहरा चिंतन ...

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आई, और एक नई कविता से भेट हुई। कवि का भावों में डूबना तो स्वाभाविक है। तभी तो जन्म होता है कविता का।

    जवाब देंहटाएं
  3. You have to share such a wonderful post,, you can convert your text in book format
    publish online book with Online Gatha

    जवाब देंहटाएं