गुरुवार, 14 मार्च 2013

क्षणिकाएँ ...


भीड़ के साथ 
मिलकर व्यक्ति 
भीड़ ही बन जाता है 
और भीड़ का कोई 
व्यक्तित्व नहीं होता 
न ही कोई 
उत्तरदायित्व होता है 
सामूहिक हत्याओं में 
विध्वंस में ....!

  ***

मन मंथन 
आत्म चिंतन से 
बेहतर उपाय 
अब हमने 
सोच लिया है 
सामूहिक 
विरोध स्वरूप 
कैंडल मार्च 
करना ....!

10 टिप्‍पणियां:

  1. सच है परिवर्तन तो सोच में लाना है.....

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  2. सुन्दर क्षणिकाएं आदरेया-

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  3. भीड में इंसान एक हिस्सा भर होता है उसका अपना सोच व वजूद शायद खत्म हो जाता है. बहुत सुंदर क्षणिकाएं.

    रामराम.

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  4. मन मंथन
    आत्म चिंतन से
    बेहतर उपाय bahut sundar.....

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  5. बहुत सुन्दर...सारगर्भित ... क्षणिकाएँ .....सुमनजी

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  6. देश में भीड्चाल का रिवाज़ है ...इसपर चिंतन आवश्यक है !

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  7. बहुत सुंदर सार्थक ,चिंतन योग्य.......
    सुमन जी

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  8. बहुत ही सार्थक और भावपूर्ण प्रस्तुति,आभार.

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  9. सोच बदलनी ही होगी. सुंदर प्रस्तुति.

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