गुरुवार, 8 सितंबर 2016

अपना-अपना आकाश ...

धारणा,
कांच की पारदर्शी
दीवार
जैसी होती है !
जब तक उससे
खुद टकरा नहीं जाते
तब तक
पता ही नहीं चलता
कि दीवार है !
सबकी अपनी-अपनी
कांच की दीवारे है
जिसमे सिमित
प्रतिबिंम्बित
सबका अपना-अपना
आकाश है .. !

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

नीम के ये पीले पत्ते ...

कुछ दिनों से देख रहीं हूँ
पेड़ की सुखी टहनियों से
टूटकर निर्लिप्त से, 

नीम के ये पीले पत्ते 
हवाओं की सरसराती ताल पर,
नाचते,थिरकते, आनंद मग्न,
उत्सव से भरे मेरे आंगन में
झर रहे है !
मानों कह रहे है ...
जिस धरती से हमने जन्म लिया
वापिस उसी धरती की गोद में,
विश्राम करने जा रहे है
हम मर नहीं रहे है !
मुझे लगा क्या पता
मृत्यु की कला सीखा रहे है !
नीम के ये पीले पत्ते  .. !

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

जिंदगी ...

 जिंदगी भी न 
मुझे कभी-कभी
जिद्दी अड़ियल 

छोटे बच्चे
जैसी लगती है !
जब तक उसे
दो चार कविता
कहानियाँ सुना
बहला फुसला
पुचकार न लूँ
तब तक
टस से मस्स
नहीं होती ... !

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

आज ह्रदय में नई उमंग है !

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !
आज ह्रदय में 
नई उमंग है !
नव वर्ष की 
नवल प्रभात है !
आओ, हम सब 
मिलकर नव संकल्प 
करे !
नव निर्माण की 
बड़ी रेखा खींचे 
छोटी रेखा को 
बिना मिटायें 
बिना चोट पहुंचाएं !
इस खूबसूरत अस्तित्व में 
इतना योगदान करें  
जाते-जाते  ...!



गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

चाँद ने सारे अस्तित्व पर एक तिलिस्म फैला दिया हो जैसे ...

सदियों से हमारी कल्पनाओं,सपनों,आस्थाओं,मान्यताओं का प्रतिक बना हुआ है चाँद ! किसी की कल्पना में उसमे चरखा कातती बुढ़िया दिखाई दी तो किसी को उसमे हिरन दिखाई दिया, तो किसी को उसमे अपने प्यारे मामा चंदामामा की छवि दिखाई दी ! कवियों, गीतकारों की लेखनी को चाँद में प्रेरणा स्त्रोत दिखाई दिया ! और किसी को करवा चौथ के व्रत का आराध्य जो उनके स्वामियों के दीर्घ जीवन की प्रार्थनाओं को सुनने वाला अस्थारूपी दैवत !

अरबों साल पहले हुई कुदरती उथल-पुथल से धरती से जो टुकड़े निकले चाँद उन्ही से बना हुआ है, वैज्ञानिकों ने इस प्रकार चाँद के अस्तित्व का पर्दाफाश किया ! चाँद को धरती का उपग्रह बना दिया ! पुरानी मान्यताएं, आस्थाएं बालू की भींत की तरह ढह गयी अब चाँद पर थे तो केवल पत्थर, धूल, और चट्टानें !

लेकिन आधुनिक पीढ़ी को एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिला चाँद को छूने की जिज्ञासा हुई ! अब वह दिन दूर नहीं जब आने वाले समय में चाँद पर बस्तियां भी बन जाएँगी ! जो भी हो एक बात सत्य है सूरज की रोशनी में जो चीजें खुरदुरी और आकर्षण विहीन दिखाई देती है वही चीजें हमें चाँद की दूधिया, रोशनी में बड़ी सम्मोहक और दिलचस्प दिखाई देने लगती है ऐसे लगता है चाँद ने सारे अस्तित्व पर एक तिलिस्म फैला दिया हो जैसे !


मंगलवार, 8 सितंबर 2015

तनाव आज विश्व समस्या बनकर उभर रही है !

तनाव,डिप्रेशन आज हम अकेले की समस्या नहीं है तनाव आज संपूर्ण विश्व समस्या बनकर उभर रही है ! आज हमारा रिश्ता नाता कहीं दूर तक संसार से तो जुड़ गया है लेकिन हमारे अपने मूल अस्तित्व से छूट गया है ! "ध्यान" से छूटकर धन से जुड़ गया है ! प्रेम से छूटकर नफरत से जुड़ गया है ! शांति से छूटकर तनाव से जुड़ गया है ! जहाँ भी देखो हर मनुष्य हाई ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन कोई न कोई बीमारी का शिकार है ! सारे प्राइवेट अस्पताल सरकारी अस्पताल मरीजों से भरे पड़े है ! आज एक शारीरिक मानसिक संपूर्ण स्वस्थ व्यक्ति खोजना मुश्किल हो गया है ! मनुष्य बाहर से जितना साधन संपन्न दिखाई देता है भीतर से उतना ही दीनहीन दुखी,विक्षुब्ध और चिंतित दिखाई देता है आज  ! और प्रत्येक मनुष्य ने यह स्वीकार ही कर लिया है कि सबकी जीवन दशा एक-सी है मै अकेला थोड़ा ही हूँ !
 
इसी संदर्भ में हमारी हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उल्लेखनीय चार युगों और उनकी विशेषताओं की सुन्दर अलंकारिक बात कुछ इस प्रकार से बताई गई है ! सतयुग अर्थात सत्य का युग जिसके सत्य,तप,शुद्धता और दया जैसे चार स्तंभ थे, जैसे एक मेज की भांति पूर्ण संतुलित युग था ! त्रेतायुग अर्थात त्रेता का अर्थ है तीन,उस युग में एक स्तंभ टूट कर गिर गया संतुलन जरा सा गड़बड़ा गया तो मनुष्य भी दुःखी  मर्यादाविहीन होता गया ! फिर आया द्वापर याने की दो पैर, और दो स्तंभ टूट कर गिर गए फिर मनुष्य और भी दुःखी,चिंतित होता गया ! अब हम चौथे युग कलियुग में जिसे हम आधुनिक युग भी कहते है निम्म तल पर आ गए है ! एक पैर पर खड़े है सोचिये कितनी देर खड़े रह सकते है ? और जीवन भीतर से और अधिक दीनहीन होता जा रहा है ! आज जब हमने अपने शरीर,मन,आत्मा से संबंध तोड़कर सारा का सारा जीवन का संतुलन बिगाड़ लिया है तब तनाव कैसे न होगा भला !

सुबह कोई भी अख़बार खोल कर देखिये हिंसा से भरे हुए है ! असमय दरवाजे पर घंटी बजी तो हम चौंक जाते है ! असमय फोन की घंटी बजे तो डर लगता है ! कोई घर आ गया तो डर कोई घर से बाहर गया तो डर, किसी को मन की बात कहने को डर पता नहीं कौन कब इसका गलत फायदा उठा ले सोचकर,ऐसे लगता है जैसे हम सब डर और दहशत के माहोल में जीने को मजबूर हो गए है हमारा निर्दोष,निर्भय जीवन खो गया लगता है !

बुधवार, 19 अगस्त 2015

"मास्टर पीस"

दुनिया से  बेखबर
समाज में व्याप्त
उपेक्षित,निंदित,
भूखी,नंगी गरीबी
किसी छायाकार की
चित्र प्रदर्शनी में
प्रशंसकों के बीच
मास्टर पीस
कहलाती है … !