गुरुवार, 3 जनवरी 2019

गतांक से आगे ....

किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है “बड़े अजीब से इस इस दुनिया के मेले है
यूँ तो दिखती भीड़ है लेकिन फिर भी सब अकेले है” !

बोधि वृक्ष के नीचे बैठे बुद्ध हमें अकेले दिखाई देते है लेकिन उनका अकेलापन हमारी तरह नहीं अपने आप में संपूर्ण है ! कहीं पढ़ा है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने सृजन में इतने अधिक डूब जाते थे कि चार-चार दिन तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकलते थे उन्हें समय का बोध ही नहीं होता था ! उनका अकेलापन नकारात्मक नहीं सृजनात्मक है ! लेकिन हमारा अकेलापन बिलकुल उस शायर के कहे अनुसार है ! मन का ख़ालीपन जीवन की किसी कमी को दर्शाता है ! शायद यही कमी,यही अकेलापन हमें जीवन में भौतिक विकास के मार्ग पर भी ले जाता है ! किंतु भौतिक पृष्ठभूमि पर किया गया बाह्य विकास फिर से दुःख,तनाव,अकेलेपन के मार्ग पर ही बढते रहना वर्तुल पर घूमते रहना है !
फिर दुःख,तनाव,अकेलेपन से बचने का क्या कोई उपाय है ? उपाय तो हम सब अपने अपने तरीक़े से करते ही है,निर्भरता एक ऐसा ही उपाय है ! अध्यात्म के पास उपाय से बेहतर समाधान मिलता है क्योंकि अध्यात्म उपाय सुझाने के लिए अकेलेपन को कोई समस्या नहीं मानता ! अध्यात्म कहता है अकेलापन व्यक्ति के अस्तित्व का ही हिस्सा है भले ही
कितना ही पीड़ादायी,भयभित करने वाला क्यों न हो इससे बचने के लियें कोई उपाय करने नहीं चाहिये !
व्यक्ति को इस सत्य को जैसा है वैसा स्वीकारना होगा सामना करना होगा ताकि मन एक नई क्रांति से गुज़र सके,उसिको महान मनोवैज्ञानिक अब्राहम मास्लो Self Actualization  कहते है !

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

अकेलापन ...!

महान अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मास्लो ने एक पिरामिड बनाया जिसको उन्होंने
पहला Self Actualization
दूसरा Esteem needs
तीसरा Social needs
चौथा Safty needs
और पाँचवा Physiological needs
इनको पाँच भागों में बाँटते हुए कहा कि मनुष्य हमेशा नीचे से ऊपर एक चीज़ पाने के बाद दूसरी चीज़ पाने के लियें प्रयत्नशील रहता है और यह तब तक चलता है जब तक उसे संपूर्णता का अहसास नहीं होता ! हम देखते है मनुष्य का जीवन इन पाँच ज़रूरतों के आसपास ही घूमता हुआ !
अकेलापन,रिक्तता,अपूर्णता ये कुछ ऐसे नकारात्मक शब्द है जो मनुष्य के जीवन में भौतिक ज़रूरतों की कमी,सुरक्षा की कमी,आत्मीय रिश्तों की या प्रेम की कमी,आत्मसम्मान की कमी,आत्मसिद्धि या बुद्धत्व की किसी न किसी कमी को दर्शाते है !

क्रमश ....

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2018

सद्‌गुण

सद्‌गुण एक ऐसा
उत्तम गुण है
जिसे सिखने की
ना ही नक़ल करने की
ज़रूरत पड़ती है !
सद्‌गुण उस ख़ूबसूरत
गुलाब के फूल की
तरह होता है जो
अपनी बंद पंखुड़ियों को
बडे शान से इस
अस्तित्व में खोलता
है !

सोमवार, 20 अगस्त 2018

निर्भार ..

फूल खिलते ही 
सुगंध बहाकर 
ले जा रही थी हवा 
फूल ने मुस्कुराकर कहा ...
आभार,
गंध से मुझे जो
कर दिया निर्भार … !

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सुहाना मौसम है !

ऊंघ रहे क्यों मन
मछुआरे ?
चलो नदी तट पर चले
सुहाना मौसम है !

खूबसूरत शब्दों का
आकर्षक जाल बुने
भावनाओं के आटे से
बनी गोलियां
सुनहरी मछलियों को
खिलायें !


छपाक से डालकर
पानी में जाल
खूब सारी मछलियों को
फंसाये !
चलो नदी तट पर चले
सुहाना मौसम है !


बुधवार, 29 मार्च 2017

कुछ विचार ऐसे भी होते है ...

विचारों की भी अपनी
उम्र होती है !
कुछ विचार जन्म
लेते ही सिकुड़ने
लगते है देर सवेर
मरने के लिए !
कुछ तो जन्म लेने से
पहले गर्भ में ही मर
जाते है !
कभी-कभार कुछ
किसी ब्लॉटिंग पेपर पर
गिरी स्याही के समान
फैलकर देश,समय,
सीमाओं के पार
कालजयी हो जाते है ... !

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

मन एक "प्रिज्म" है !

आत्मा की 
किरणे श्वेत रंग की
जब तिमिर आवरण 
को चीरकर 
मन नाम के
प्रिज्म से टकराती है 
तब यह 
ब्लैक एण्ड व्हाईट दुनिया 
इंद्रधनुषी दिखाई देने 
लगती है  !
खूबसूरत खयाली 
घूँघट की ओट में 
छिप जाती है प्रकृति 
सुंदरता अवर्णनीय 
है जिसकी  !