रविवार, 10 जनवरी 2021

वही तो गाता है ...

सुमधुर,
सनातन शाश्वत गीत 
हृदय के तारों पर 
वही तो गाता है 
सेकडों कंठों को 
अपना उपकरण बनाकर !
जिसमें से कोई एक कंठ 
किसी के 
सोए पड़े तारों को 
झनझना कर जगाता है !
हृदय के तारों पर 
गीत वही तो गाता है !

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

थोड़ा छू लेने दो प्रभु को !

बुढ़ापे को रिवर्स तो 
नहीं किया जा सकता 
पर हाँ 
चिड़चिड़े,सनकी,खूसट 
बुढा/बूढ़ी होने से 
खुद को 
बचाया जा सकता है 
थोड़े कलात्मक उपाय 
करके !
थोड़ा योग,प्रयोगी हो जाओ !
थोड़ा ध्यान,प्रेममय हो जाओ !
थोड़ा गीत,संगीतमय हो जाओ !
थोड़ा काव्यसे,रसमय हो जाओ !
सुख दुःख की बरसों की जमीं
गाठों को पिघलाकर 
थोड़ा छू लेने दो प्रभु को !

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

प्रार्थना ...

 करोड़ों लोग यूँही 

ईश्वर की प्रार्थना 

नहीं करते !

प्रार्थना शायद हमें 

मनवांछित परिणाम

देती है !

प्रार्थना शायद हमें 

 थोड़ा सा सुकून देती है !

किंतु,

जिन तथ्यों को जैसी है वैसी ही 

स्वीकार करने की बजाय 

उन तथ्यों से,अपने आप से 

प्रार्थना के माध्यम से 

     क्या हम 

पलायन नहीं करते ?

एक सुविधाजनक पलायन !


सोमवार, 20 अप्रैल 2020

उम्र वैसे ही उतरती है ....

कभी किसी 
सौम्य,सुंदर चेहरे पर 
उम्र वैसे ही उतरती है 
जैसे दिन के पश्चात 
सहज,प्राकृतिक रूप से 
साँझ का उतरना !

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

सूरज की दादागिरी !

उधर
पानी का स्तर
घट गया !
इधर
पानी को लेकर
झगड़े बढ़ गए
सप्लाई कम हुई !
ऐसे में देखिये
बढ़ गई
सूरज की दादागिरी !
किरण किरण
लिए संग
उलीच उलीच कर
जलाशयों से घर
ले जा रहा है
पानी  ... !

सोमवार, 4 मार्च 2019

बसंत ...!

नियमित समय पर
पिछले वर्ष भी
आया था बसंत
इस वर्ष भी आया है
अगले वर्ष भी आयेगा
इसमें ख़ास बात
 क्या है ?

जो पड़े है अपने ही
खोल में बंद उन अहंकारी
बीजों के लिए नहीं
जो बंद खोल को
सहजता से त्यागकर
मिट्टी में ख़ुद को
गलाते है !
सर्दी,गरमी,तेज़
बारिश को भी
प्रसन्नता से सहकर
अंकुरित होते है
जो आँधी,तूफ़ानों से
निडरता से लड़कर
पल्लवित,पुष्पित हो
हवाओं में अपनी
ख़ुशबू बिखराते है
उन फूलों के लिए ही
हर वर्ष आता है बसंत
यही ख़ास बात है !

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

अहंकार अमरबेल है !

किसी भी वृक्ष पर
फैली हुई अमरबेल
धीरे-धीरे उस वृक्ष का
सारा रस चूसकर
उसके जीवन को ही
लील लेती है !
दूर-दूर तक फैला
मैं मैं करनेवाला
हमारा अहंकार
अमरबेल ही तो है
जिसमें कोई जड़
नहीं दिखती !
उपरसे हरा भरा
भीतरसे रुखा सूखा
जीवन दिखता है
पर !