शुक्रवार, 11 मार्च 2016

नीम के ये पीले पत्ते ...

कुछ दिनों से देख रहीं हूँ
पेड़ की सुखी टहनियों से
टूटकर निर्लिप्त से, 

नीम के ये पीले पत्ते 
हवाओं की सरसराती ताल पर,
नाचते,थिरकते, आनंद मग्न,
उत्सव से भरे मेरे आंगन में
झर रहे है !
मानों कह रहे है ...
जिस धरती से हमने जन्म लिया
वापिस उसी धरती की गोद में,
विश्राम करने जा रहे है
हम मर नहीं रहे है !
मुझे लगा क्या पता
मृत्यु की कला सीखा रहे है !
नीम के ये पीले पत्ते  .. !

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

जिंदगी ...

 जिंदगी भी न 
मुझे कभी-कभी
जिद्दी अड़ियल 

छोटे बच्चे
जैसी लगती है !
जब तक उसे
दो चार कविता
कहानियाँ सुना
बहला फुसला
पुचकार न लूँ
तब तक
टस से मस्स
नहीं होती ... !

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

आज ह्रदय में नई उमंग है !

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !
आज ह्रदय में 
नई उमंग है !
नव वर्ष की 
नवल प्रभात है !
आओ, हम सब 
मिलकर नव संकल्प 
करे !
नव निर्माण की 
बड़ी रेखा खींचे 
छोटी रेखा को 
बिना मिटायें 
बिना चोट पहुंचाएं !
इस खूबसूरत अस्तित्व में 
इतना योगदान करें  
जाते-जाते  ...!



गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

चाँद ने सारे अस्तित्व पर एक तिलिस्म फैला दिया हो जैसे ...

सदियों से हमारी कल्पनाओं,सपनों,आस्थाओं,मान्यताओं का प्रतिक बना हुआ है चाँद ! किसी की कल्पना में उसमे चरखा कातती बुढ़िया दिखाई दी तो किसी को उसमे हिरन दिखाई दिया, तो किसी को उसमे अपने प्यारे मामा चंदामामा की छवि दिखाई दी ! कवियों, गीतकारों की लेखनी को चाँद में प्रेरणा स्त्रोत दिखाई दिया ! और किसी को करवा चौथ के व्रत का आराध्य जो उनके स्वामियों के दीर्घ जीवन की प्रार्थनाओं को सुनने वाला अस्थारूपी दैवत !

अरबों साल पहले हुई कुदरती उथल-पुथल से धरती से जो टुकड़े निकले चाँद उन्ही से बना हुआ है, वैज्ञानिकों ने इस प्रकार चाँद के अस्तित्व का पर्दाफाश किया ! चाँद को धरती का उपग्रह बना दिया ! पुरानी मान्यताएं, आस्थाएं बालू की भींत की तरह ढह गयी अब चाँद पर थे तो केवल पत्थर, धूल, और चट्टानें !

लेकिन आधुनिक पीढ़ी को एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिला चाँद को छूने की जिज्ञासा हुई ! अब वह दिन दूर नहीं जब आने वाले समय में चाँद पर बस्तियां भी बन जाएँगी ! जो भी हो एक बात सत्य है सूरज की रोशनी में जो चीजें खुरदुरी और आकर्षण विहीन दिखाई देती है वही चीजें हमें चाँद की दूधिया, रोशनी में बड़ी सम्मोहक और दिलचस्प दिखाई देने लगती है ऐसे लगता है चाँद ने सारे अस्तित्व पर एक तिलिस्म फैला दिया हो जैसे !


मंगलवार, 8 सितंबर 2015

तनाव आज विश्व समस्या बनकर उभर रही है !

तनाव,डिप्रेशन आज हम अकेले की समस्या नहीं है तनाव आज संपूर्ण विश्व समस्या बनकर उभर रही है ! आज हमारा रिश्ता नाता कहीं दूर तक संसार से तो जुड़ गया है लेकिन हमारे अपने मूल अस्तित्व से छूट गया है ! "ध्यान" से छूटकर धन से जुड़ गया है ! प्रेम से छूटकर नफरत से जुड़ गया है ! शांति से छूटकर तनाव से जुड़ गया है ! जहाँ भी देखो हर मनुष्य हाई ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन कोई न कोई बीमारी का शिकार है ! सारे प्राइवेट अस्पताल सरकारी अस्पताल मरीजों से भरे पड़े है ! आज एक शारीरिक मानसिक संपूर्ण स्वस्थ व्यक्ति खोजना मुश्किल हो गया है ! मनुष्य बाहर से जितना साधन संपन्न दिखाई देता है भीतर से उतना ही दीनहीन दुखी,विक्षुब्ध और चिंतित दिखाई देता है आज  ! और प्रत्येक मनुष्य ने यह स्वीकार ही कर लिया है कि सबकी जीवन दशा एक-सी है मै अकेला थोड़ा ही हूँ !
 
इसी संदर्भ में हमारी हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उल्लेखनीय चार युगों और उनकी विशेषताओं की सुन्दर अलंकारिक बात कुछ इस प्रकार से बताई गई है ! सतयुग अर्थात सत्य का युग जिसके सत्य,तप,शुद्धता और दया जैसे चार स्तंभ थे, जैसे एक मेज की भांति पूर्ण संतुलित युग था ! त्रेतायुग अर्थात त्रेता का अर्थ है तीन,उस युग में एक स्तंभ टूट कर गिर गया संतुलन जरा सा गड़बड़ा गया तो मनुष्य भी दुःखी  मर्यादाविहीन होता गया ! फिर आया द्वापर याने की दो पैर, और दो स्तंभ टूट कर गिर गए फिर मनुष्य और भी दुःखी,चिंतित होता गया ! अब हम चौथे युग कलियुग में जिसे हम आधुनिक युग भी कहते है निम्म तल पर आ गए है ! एक पैर पर खड़े है सोचिये कितनी देर खड़े रह सकते है ? और जीवन भीतर से और अधिक दीनहीन होता जा रहा है ! आज जब हमने अपने शरीर,मन,आत्मा से संबंध तोड़कर सारा का सारा जीवन का संतुलन बिगाड़ लिया है तब तनाव कैसे न होगा भला !

सुबह कोई भी अख़बार खोल कर देखिये हिंसा से भरे हुए है ! असमय दरवाजे पर घंटी बजी तो हम चौंक जाते है ! असमय फोन की घंटी बजे तो डर लगता है ! कोई घर आ गया तो डर कोई घर से बाहर गया तो डर, किसी को मन की बात कहने को डर पता नहीं कौन कब इसका गलत फायदा उठा ले सोचकर,ऐसे लगता है जैसे हम सब डर और दहशत के माहोल में जीने को मजबूर हो गए है हमारा निर्दोष,निर्भय जीवन खो गया लगता है !

बुधवार, 19 अगस्त 2015

"मास्टर पीस"

दुनिया से  बेखबर
समाज में व्याप्त
उपेक्षित,निंदित,
भूखी,नंगी गरीबी
किसी छायाकार की
चित्र प्रदर्शनी में
प्रशंसकों के बीच
मास्टर पीस
कहलाती है … !

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

एक मनुष्य के भीतर अच्छाई बुराई दोनों की संभावनायें है !

बच्चा जब जन्म लेता है तो साथ में जीवन को परमात्मा के उपहार के तौर पर लाता है ! उसकी चेतना बिलकुल कोरे कागज के समान होती है ! और लोग उसपर अपने अपने सहूलियत के हिसाब से एक नाम का ठप्पा, एक जाती ठप्पा, एक धर्म का ठप्पा, एक देश का ठप्पा लगा देते है ! और जैसे जैसे वह बच्चा बड़ा होने लगता उसमे यह संस्कार कूट कूट कर भर दिया जाता है कि जरुरत पड़े तो इन ठप्पों की खातिर अपनी जान दे देना ! उसे कभी यह अहसास नहीं करवाते की तुम्हारी जान इन सबसे ऊपर है तुम्हारा जीवन सबसे कीमती है ! और बच्चा उन्ही संस्कारों की वजह से जिंदगी भर एक दुश्चक्र में फंस कर परमात्मा के दिए हुए उस जीवन रूपी कीमती उपहार का क्या हश्र कर लेता है इसी संदर्भ में मुझे ओशो की सुनाई हुई यह कहानी बहुत प्यारी लगती है !

किसी देश में एक चित्रकार था ! वह जब अपनी युवावस्था में था तो सोचा कि मै एक ऐसा चित्र बनाऊं, जिसमे भगवान का आनंद झलकता हो ! मै ऐसी दो आँखे चित्रित करूँ जिनमे अनंत शांति झलकती हो ! मै एक ऐसे व्यक्ति को खोजूं जिसका चित्र जीवन के जो पार है, जगत के जो दूर है उसकी खबर लाता हो ! और वह अपने देश के गांव-गांव घूमा, जंगल-जंगल छान मारा और आखिर एक पहाड़ पर एक चरवाहे को उसने खोज लिया ! उसकी आँखों में कोई झलक थी ! उसके चेहरे की रूप-रेखा में कोई दूर की खबर थी ! उसे देखकर ही लगता था कि मनुष्य के भीतर परमात्मा भी है ! उसने उसके चित्र को बनाया ! उस चित्र की लाखों प्रतियां गांव-गांव, दूर-दूर के देशों में बिकी ! लोगों ने उस चित्र को घर में टांगकर अपने को धन्य समझा !

फिर बीस वर्ष बाद, वह चित्रकार बूढ़ा हो गया था ! और उस चित्रकार को एक ख़याल और आया … जीवन भर के अनुभव से उसे पता चला था कि आदमी में भगवान ही अगर अकेला होता तो ठीक था, आदमी में शैतान भी दिखाई पड़ता है ! उसने सोचा कि मै एक चित्र और बनाऊं, जिसमे आदमी के भीतर शैतान की छवि हो, तब दोनों चित्र पुरे मनुष्य के चित्र बन सकेंगे ! वह फिर गया बुढ़ापे में जुआघरों में, शराबघरों में, पागलघरों में, उसने खोजबीन की उस आदमी की जो आदमी न हो, शैतान हो ! जिसकी आँखों में नरक की लपटे जलती हो, जिसके चहरे की आकृति उस सबका स्मरण दिलाती हो, जो अशुभ है, कुरूप है, असुंदर है ! वह पाप की प्रतिमा की खोज में निकला ! एक प्रतिमा उसने परमात्मा की बनायी थी, वह एक प्रतिमा पाप की भी बनाना चाहता था ! और बहुत खोजने के बाद एक कारागृह में उसे एक कैदी मिल गया ! जिसने न जाने कितनी हत्याएं की थी और जो थोड़े ही दिनों के बाद मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था ! फांसी पर लटकाया जाने को था ! उस आदमी की आँखों में नरक के दर्शन होते थे, घृणा जैसे साक्षात थी ! उस आदमी के चहरे की रुपरेखा ऐसी थी कि वैसा कुरूप मनुष्य खोजना मुश्किल था ! उस चित्रकार ने उसका चित्र बनाया ! जिस दिन उसका चित्र बनकर पूरा हुआ, वह अपने पहले चित्र को भी लेकर कारागृह को आया और दोनों चित्रों को पास-पास रखकर देखने लगा कि कौन-सा चित्र श्रेष्ठ बना है ! तय करना मुश्किल था ! चित्रकार खुद मुग्ध हो गया था ! दोनों चित्र अदभुत थे ! कौन-सा श्रेष्ठ था, कला की दृष्टी से, यह तय करना मुश्किल था ! और तभी उस चित्रकार को पीछे किसी के रोने की आवाज सुनाई पड़ी ! लौटकर देखा ,तो वह कैदी जंजीरों में बंधा रो रहा है, जिसकी उसने तस्वीर बनायीं थी ! चित्रकार हैरान हुआ उसने कहा कि मेरे दोस्त तुम रो क्यों रहे हो ? चित्रों को देखकर तुम्हे तकलीफ हुई ? उस कैदी ने कहा इतने दिनों तक छिपाने की कोशिश की, लेकिन आज मै हार गया हूँ ! शायद तुम्हे पता नहीं कि पहली तस्वीर भी तुमने मेरी ही बनायीं थी ! ये दोनों तस्वीरें मेरी ही है !
कहने का सार बस इतना-सा है कि एक मनुष्य के भीतर अच्छाई बुराई दोनों की संभावनायें है बहुत कम मनुष्य सौभाग्यशाली होते है जो अपने भीतर अच्छाई को उभार पाते है !