मंगलवार, 3 सितंबर 2013

"फ्रेश फिश सोल्ड हियर "

मै ये हूँ, मै वो हूँ, उसकी कार से मेरी कार महँगी और बड़ी है, उसके बंगले से मेरा बंगला बड़ा है,उसके मठ से मेरा मठ बड़ा है, उसके चेलों से मेंरे चेले अधिक है, … हम हमारे चारो ओर इसी फाल्स इगो का प्रसार प्रचार होता हुआ अक्सर देखते है ! क्या कभी किसी ने इस मै मै कहने वाले इगो को कभी देखा है ? काश हम इस इगो को समझ पाते खोज पाते,जो भीतर कही है ही नहीं, हम भी उस दुकानदार की तरह सारी तख्तियां निकाल फेंकते जो की केवल दुकाने चलाने के लिए हमारे स्वभाव पर हमने लटकाई हुई है, जिससे हमारा वास्तविक स्वभाव ढक सा गया है ! क्यों न हम उस कहानी को ही सुने जिससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो  ! 

एक गांव में एक आदमी ने मछलियों की एक दुकान खोली, उस गांव में यह पहली ही दुकान थी इसलिए दुकानदार ने बहुत सुन्दर तख्ती बनवाई और उसपर लिखवाया कि, "फ्रेश फिश सोल्ड हियर" अर्थात यहाँ ताजी मछलियां बेचीं जाती है ! पहले दिन पहला ग्राहक आया और उसने उस तख्ती को देखकर कहा  … "फ्रेश फिश सोल्ड हियर " ? कही बासी मछलियां भी बेचीं जाती है ? ताज़ी लिखने की क्या जरुरत है ? दुकानदार ने सोचा ग्राहक ठीक ही तो कह रहा है सो उसने "फ्रेश"शब्द तख्ती से हटा दिया अब रह गया था सिर्फ "फिश सोल्ड हियर" याने की मछलियाँ बेचीं जाती है ! फिर दुसरे दिन एक बूढी औरत आयी और उसने उस तख्ती को देखकर कहा "फिश सोल्ड हियर" ? यहाँ नहीं तो कही और भी मछलियाँ बेचते हो क्या ? उस दुकानदार ने सोचा बूढी औरत सच ही तो कह रही है "हियर" शब्द बिलकुल बेकार है सो उसने उस शब्द को हटाकर केवल तख्ती पर लिख दिया "फिश सोल्ड" ! फिर तीसरे दिन एक आदमी ने उस तख्ती को देखकर कहा "फिश सोल्ड" का क्या मतलब है भाई, मुफ्त भी देते हो क्या  ? उस दुकानदार को लगा यह आदमी भी सच कह रहा है सोल्ड शब्द भी बेकार है सो उसने उसे भी हटा दिया अब सिर्फ उस तख्ती पर रह गया "फिश" ! 

अगले दिन एक बुढा व्यक्ति आया उसने उस तख्ती को देखकर कहा  …  "फिश"? अरे भाई किसी अंधे को भी दूर से ही पता चलता है कि,दुकान में मछलियाँ है दूर से ही इनकी बास जो आ रही है फिर फिश लिखने की क्या जरुरत है ? दुकानदार को लगा यह व्यक्ति भी सही कह रहा है सच में मछलियों की गंध से ही पता चलता है फिश लिखने की कोई जरुरत नहीं है सो उसने फिश शब्द को भी निकाल दिया ! अब सिर्फ दुकान पर खाली तख्ती लटकी हुई थी !
फिर अगले दिन और एक आदमी आ गया उसने उस खाली तख्ती को देखकर कहा   "क्यों भाई व्यर्थ की खाली तख्ती लटकाई है ? इस तख्ती से दुकान पर आड़ पड रही है " और उसके बाद उस दुकानदार ने उस तख्ती को भी निकाल कर फ़ेंक दिया ! एक एक करके हर व्यर्थ चीज हटती चली गई अंत में बच गया था केवल खाली स्पेस,केवल शून्य जो की हमारा स्वभाव है लेकिन हमने न जाने इस प्रकार की कितनी ही मै,मै की तख्तियां उस स्वभाव पर लटकाई 
हुई है !


8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (05-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 107" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  2. क्या बात कही तुमने प्यारे
    हर व्यक्ति सिखाने आता है!
    लगता है समझ हममें ही नहीं
    हर मूर्ख पढ़ाने, आता है !

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  3. यही मैं की तख्तियां ही जीवन में घसीट ले जाती हैं और कुछ भी याद नही रहता, बहुत ही सार्थक आलेख.

    रामराम.

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  4. खाली स्पेस तो सही है पर जब तक दूसरों की अकल के सहारे चलेंगे तो अपना वजूद खो देंगे ...

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  5. सहज और सार्थक अभिव्यक्ति। 'सुने दुनिया की करे मन का' एक कहावत है इसकी ओर आपका पाठ निर्देश करता है। परंतु भूमिका के भीतर आपने जो बात कहीं है वह भी सही है कारण इंसान अनेक मुखौटों और चेहरों के साथ जीने की कोशिश करता है, अर्थात् तख्तियों के साथ। असल बात मुखौटों तथा तख्ती की होती नहीं, वह अपनी आत्मा को सुने तो बेहतर होगा।

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  6. एक एक करके हर व्यर्थ चीज हटती चली गई अंत में बच गया था केवल खाली स्पेस,केवल शून्य जो की हमारा स्वभाव है लेकिन हमने न जाने इस प्रकार की कितनी ही मै,मै की तख्तियां उस स्वभाव पर लटकाई
    हुई है !

    विचारणीय प्रस्तुति।।

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