मंगलवार, 11 जून 2013

महत्वाकांक्षाओं की शरशैया पर .....

सुबह घर से
निकलो तो 
साँझ होते-होते 
किसी गांव 
किसी बस्ती तक 
पहुंचा ही देती है 
घुमावदार पगडंडी !
इसकी अपेक्षा 
राजपथ अपने 
मुकाम तक 
पहुंचाता कम 
भरमाता,भटकाता 
अधिक है इसलिए 
हे पितामह ...
अपनी जिम्मेदारियों का 
बोझ निश्चिंत 
नए कंधों पर 
उतार कर 
थके क़दमों को 
अब तो 
विराम दे दो  
घायल तन 
घायल 
आत्मा लिए 
कब तक 
पड़े रहोगे इस 
महत्वाकांक्षाओं की 
शरशैया  पर .....?


21 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन और महत्वाकांक्षाओं के बीच फंसा मन और उससे उपजे भाव ...सुन्दर अभिव्यक्ति ...सुमन जी ....!!

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  2. अच्छी रचना, बहुत सुंदर
    बहुत सुंदर

    मीडिया के भीतर की बुराई जाननी है, फिर तो जरूर पढिए ये लेख ।
    हमारे दूसरे ब्लाग TV स्टेशन पर। " ABP न्यूज : ये कैसा ब्रेकिंग न्यूज ! "
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/06/abp.html

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  3. पितामह के लिए सार्थक सन्देश और सुंदर अभिव्यक्ति.... !!

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  4. बहुत ही सुंदर बिंब लिये आपने, अति उत्कृष्ट रचना.

    रामराम.

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  5. हमारा मन ही भीष्म पितामह है जो अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते इतने संताप में रहता है. कल अच्छा होगा...परसों अच्छा होगा...इसी लालसा के चलते सूर्य के उतरायण होने का इंतजार चलता रहता है.

    बहुत सुंदर.

    रामराम.

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  6. हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार भावसंयोजन .आपको बधाई

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  7. आपकी यह रचना कल गुरुवार (13-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  8. बहुत सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति . आभार रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है . आप भी दें अपना मत सूरज पंचोली दंड के भागी .नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN क्या क़र्ज़ अदा कर पाओगे?

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  9. कलयुग में पितामह भी बेचैन हैं ...क्या दोष दें !!

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    1. आप भी गलत नहीं है सतीश जी,
      पितामह सिर्फ राजनीती में ही नहीं कई
      सारे घरों में भी है !

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  10. महत्वाकांक्षाओं की
    शरशैया पर .....?

    सतीश जी, आपकी कलयुग की बात से ध्यान में आया कि, बीजेपी के भीष्म पितामह माने जाने वाले आडवाणी जी पर भी सुमन जी की उपरोक्त पंक्तियां सटीक बैठती हैं.

    रामराम.

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    1. सही पहचाना है ताऊ,
      आभार सटीक टिप्पणी के लिए !

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  11. सहजता से मार्मिक घांव। कब तक चलना और कब रूकना हर एक को पता होना चाहिए। मिथकीय संदर्भ लेती कविता वर्तमान को व्यक्त कर रही है।

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  12. आपकी यह प्रस्तुति कल चर्चा मंच पर है
    धन्यवाद

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  13. बहुत सुन्दर. आपकी इन पक्तियों को पढ़कर कैफ़ी साब का शेर याद आया कि-

    इंसां के ख्वाहिशों की कोई इन्तेहा नहीं
    दो गज़ ज़मीन चाहिए दो गज कफ़न के बाद.

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  14. उत्तम सलाह ,सटीक अभिव्यक्ति
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post: प्रेम- पहेली
    LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

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  15. अच्छी रचना, बहुत सुंदर

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