बुधवार, 16 जनवरी 2013

धर्म और विज्ञान !


मैंने सुना कि, एक गांव में दो मित्र रहा करते थे ! दोनों का स्वभाव बिलकुल भिन्न था  एक था आस्तिक और दूसरा था नास्तिक ! अक्सर दोनों में इसी बात पर बहस हो जाती और सारा गांव उनकी बहस बाजी से परेशान रहता ! दोनों बड़े विद्वान् तार्किक थे ! इनके तर्कों से तय कर पाना मुश्किल था कि कौन सही है कौन गलत ! तंग आकर गांववालों ने कहा आज ही फैसला हो जाना चाहिए कि, कौन सही है कौन गलत है ! नाहक हम लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है ! आखरी बार विवाद हुआ उस दिन दोनों में, सारा गांव इकठ्ठा हुआ देखने ! आस्तिक ने परमात्मा के लिए दलीले दी नास्तिक ने उसके विरोध में दलीले दी दोनों ने एक दुसरे के तर्कों का खंडन किया, दोनों ने अपना समर्थन किया ! दोनों बड़े पंडित थे ! एक से एक तर्क दोनों ने लोगों के सामने रखे ! और फिर रात होते होते कुछ ऐसा हुआ कि, जिसकी किसीने कल्पना नहीं की थी ! जो आस्तिक था वह नास्तिक हो गया, जो नास्तिक था वह आस्तिक हो गया ! विवाद का इस प्रकार अंत हुआ कि, दोनों एक दुसरे के तर्कों से राजी हो गए लेकिन गांववालों की परेशानी फिर भी कायम रही क्योंके, उस गाँव में फिर एक नास्तिक रहा फिर एक आस्तिक रहा जाहिर सी बात है गाँव की समस्या जैसे थी वैसे ही रही होगी !

आज देश में वही हो रहा है कभी उस गांव में हुआ था ! पूरब, पश्चिम दोनों संस्कृतियों में विवाद है कौनसी संस्कृति अच्छी कौनसी बुरी ..और समस्याये वही की वही ! पश्चिम  की संस्कृति विज्ञानं से हार रही है भौतिक सुखों से उब रही है ...छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में जब खिलौनों की जगह पिस्तोल,गन आ जाते है तो चिंता का विषय है वहां भी ! पूरब की  संस्कृति धर्म से हार रही है क्योंकि पाखंड बढ़ा है ....इनकी आस्तिकता भी आज के दौर में सिवाय एक पाखंड के सिवा कुछ नहीं है, पूरब की संस्कृति, सभ्यता के लिए भी यह चिंता और चिंतन का विषय है ! इसी संदर्भ में कल अनुराग जी के ब्लॉग पर एक अच्छी पोस्ट पढ़ने को मिली निचे मेरी टिप्पणी उनके पोस्ट के सन्दर्भ में थी यहाँ पेस्ट कर रही हूँ  ताकि, आप सबको समझने में और अधिक आसानी होगी !

पूरब और पश्चिम की संस्कृति को मै इस प्रकार से देखती हूँ .....
"देश यदि शरीर है तो संस्कृति उस देश की आत्मा है ! पूरब  की संस्कृति से धर्म विकसित हुआ जिसने जन्म दिया आध्यात्म वाद  ( धर्म से मेरा मतलब संप्रदाय नहीं "मै कौन हूँ "इस तत्व को जानने का
 विज्ञान ) पश्चिम की संस्कृति से विज्ञान विकसित हुवा जिसने जन्म दिया भौतिक वाद, जिससे मनुष्य साधन संपन्न तो बहुत हुआ पर आत्मा के तल पर कोई विकास नहीं हुआ ! पूरब ने भौतिक सुखों को अनदेखा किया आत्मा को ही सर्वोपरि माना, पश्चिम ने आत्मा को अनदेखा किया भौतिक सुखों को ही सर्वोपरि माना  इसीकारण आज हम देखते है दोनों संस्कृतियों में एक दुसरे के प्रति निंदा का भाव भी है आकर्षण भी है ! आज के दौर में दोनों एक दुसरे के विपरीत दिशा में लौट रही है! हमारे ही शहर में आज हर घर में कमसे कम एक व्यक्ति अमेरिका में है ! डॉलर्स का नाम सुनते ही भारतीयों के मुह से लार टपकती है ! उनके डालर्स के प्रति तो प्रेम, आसक्ति है और संस्कृति के प्रति निदा का भाव है यह दोगला पन है इनमे, हमारे यहाँ के नेता संत, महंत सब इसी श्रेणी में आते है ! पश्चिम की संस्कृति यहाँ का रुख करने का कारण वही था है अभी भी ओशो के आश्रम में,भौतिक सुखों से वे भी उब गए है आत्मा की उन्हें तलाश है और इन्हें भौतिक सुखों की, मेरी बहन सालों से अमेरिका में है उसकी बातों से, आपके कहे अनुसार मेरी समझ के अनुसार मुझे लगता है आज जिस हालातों से हमारा देश गुजर रहा है उसे देखते हुए ...पाश्चात्य संस्कृति कई बेहतर लगती है मुझे ! लेकिन मेरा अपना मानना यही है कि, जब तक भौतिक सुखों की जरुरत को नहीं समझेंगे तब तक आत्मा का विकास भी संभव नहीं है ! रही होगी कभी हमारी संस्कृति उन्नत लेकिन आज नहीं है ...निचे से लेकर ऊपर तक सबका नैतिक पतन होते हुए साफ दिखाई दे रहा है ! बलात्कारी एक दिन में पैदा नहीं होता इसके लिए मै जिम्मेदार मानती हूँ माता -पिता को, समाज को,शिक्षा को, सरकार,कानून को संस्कृति को" !

समय के साथ संस्कृति में बदलाव आने चाहिए ...जब तक धर्म और विज्ञान समान मात्रा में विकसित नहीं होंगे मनुष्य का संपूर्ण विकास संभव नहीं ! विज्ञान यह समझाए कि, भौतिक सुखों के बिना आत्मा का विकास संभव नहीं, धर्म यह घोषणा करे कि, आत्मा और शरीर दोनों एक दुसरे के पूरक है दोनों अलग नहीं, दोनों का सुख अलग नहीं संपूर्ण जीवन ही परमात्मा का वरदान है ! पुरानी सारी व्यवस्था बिगड़ चुकी है और नई पीढ़ी के लिए हमने नई कोई व्यवस्था विकसित करने की बजाय पुरानी व्यवस्था उनके हाथों में थमा दी है, इसीकारण हम देख रहे है आज नई पीढ़ी भी एक प्रकार से संक्रमण काल से गुजर रही है ! नई पुरानी पीढ़ी में असमंजस की स्थिति बनी हुई है ! यह मेरी अपनी सोच है जरुरी नहीं आप भी मेरी इन बातों से सहमत हो लेकिन आप क्या सोचते हो इतना तो बता ही सकते हो !

10 टिप्‍पणियां:

  1. "पुरानी सारी व्यवस्था बिगड़ चुकी है और नई पीढ़ी के लिए हमने नई कोई व्यवस्था विकसित करने की बजाय पुरानी व्यवस्था उनके हाथों में थमा दी है, इसीकारण हम देख रहे है आज नई पीढ़ी भी एक प्रकार से संक्रमण काल से गुजर रही है!"

    आपने बहुत ही सुंदर और विश्लेषणात्मक ढंग से विषय को व्याख्यायित किया है जो अपना समग्र प्रभाव छोडता है, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  2. जब तक धर्म और विज्ञान समान मात्रा में विकसित नहीं होंगे मनुष्य का संपूर्ण विकास संभव नहीं,,,,,

    सार्थक सटीक आलेख,,,

    recent post: मातृभूमि,

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  3. बहुत सार्थक विश्लेषण..कोई भी संस्कृति पूरी तरह बुरी या सम्पूर्ण नहीं होती. यह सच है कि आज की पीढ़ी पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों के बीच में उलझ कर रह गयी है. आवश्यकता है उन्हें उचित मार्ग दर्शन की, और इस कार्य में परिवार का बहुत महत्वपूर्ण रोल है..

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  4. हमें चाहिए की आज की पीढ़ी को (जो की स्वयं जारूक हो गयी है ) हम सिर्फ इतना अहसास कराएँ कि भौतिक सुख के साथ आत्मिक सुख का भी अपना आनंद है ...उससे उनका साक्षात्कार करवाएँ ...अपने तरीके से ..लेकिन ऐसे कि उनके मन में उसके प्रति कौतुहल बढ़े , और वे उसे और जानने के लिए स्वयं प्रयत्न करें ....लेख बहुत अच्छा लगा सुमनजी ...साभार ...!

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  5. @ बलात्कारी एक दिन में पैदा नहीं होता इसके लिए मै जिम्मेदार मानती हूँ माता -पिता को, समाज को,शिक्षा को, सरकार,कानून को संस्कृति को...

    सच है ...
    प्रभावशाली और आवश्यक लेख , आभार

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  6. गंभीर समस्या पर सामयिक सटीक आलेख...बहुत बहुत बधाई...

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