बुधवार, 20 अप्रैल 2011

कच्ची कैरी ....... (स्मृतियाँ)


इन गर्मीयोंके दिनों में, ताज़ी,ठंडी हवा का आनंद लेने मै और मेरी बिटिया अक्सर हमारे छतपर चले आते है! वह कानोंमे इयरफोन लगाये अपने मोबाईल पर फ़िल्मी गीतोंका आनंद लेती है ! और मै हमेशा की तरह अपने खयालोंमे खो जाती हूँ ! आजकल कच्ची कैरियों का सीजन चल रहा है! जैसेही,कैरीयोंका नाम सुना की मुँह में पानी आजाता है ! किन्तु इस उम्र में, कच्ची कैरियोंकी कल्पना मात्र से मेरे तो दांत खट्टे होने लगते है !  कैरी खाने की बात तो दुरकी है ! बचपन में कैरियोंको काटकर उसके ऊपर नमक मिर्च लगाकर खानेका मजा ही कुछ और था ! छतपर अचानक इन कैरियोंका जिक्र मै क्योंकर करने लगी भला ? यही सोच रहे है ना? बस वही तो बताने जा रही हूँ ! हमारे पड़ोस में बूढ़े चाचाजी रहते है ! हमारे मुहल्ले में सब लोग उनको यही नामसे जानते है ! उनके आँगन में आम का बहुत बड़ा पेड़ है ! इतना बड़ा की, उसकी लम्बी-लम्बी शाखायें हमारे छत तक पहुँच गई है वह भी कैरियोंसे लदी हुई ! बेचारे पेड़, हम मनुष्य की तरह थोड़े ही अपने पराये का भेद करते है ! वह तो जिधर चाहे अपनी शाखाओंको बिनधास्त फैला देते है! कैरियोंसे लदी शाखायें,हाथ बढ़ाने की देर कैरी हाथ में ! जैसे ही मैंने कैरियोंकी तरफ हाथ बढाया मेरी बिटिया ने दुरसे ही, चिल्लाकर कहा ना .....ना....ममा किसीके पेड़ की कैरिया चुराना बुरी बात है ! तुम्हे चाहिए तो मै कल बाजार से लाकर दूंगी !  हाँ ..हाँ.. मुझे पता है आजकल कच्ची कैरियोंका सीजन चल रहा है ! बड़ी आसानी से ठेला बंडीयोंपर  मिलने लगी है ! मैंने कुछ नाराजगीसे, अपने बढे हुये हाथोंको वापिस खींचते हुये कहा ! किसी बच्चे को उसका मनपसंद काम करनेसे रोकने पर जो स्थिति होती है वही,स्थिति मेरी उस समय हुई !  बचपन की उन पूरानी यादोंमे एकबार फिरसे खो गई मै !
       नदी के किनारे छोटासा प्यारा गाँव है हमारा ! उस गाँव में हमारी अपनी आमोंकी आमराई है! विभिन्न किस्म के आम, मीठे आम, रसीले आम, अचार के आम ना जाने कितनी किस्मे ! जब आम पककर तोड़ने लायक हो जाते है तो, उसे पेड़परसे बहुत सावधानीसे उतारा जाता है ! ताकि आम निचे जमीन पर गिरकर ख़राब न हो ! प्राकृतिक रूपसे पके आमोका स्वाद बहुत मीठा होता है ! आजकल शहरोंमे आम,चीकू,केला,संतरा इन सब फलोंको कार्बाइड से पकाया जाता है ! फलोंका प्राकृतिक स्वाद, गंध हम तो जैसे भूल ही गए है ! खैर, पके हुये आमोंको टोकरियों में भर-भरकर जब मेरे बाबा (पिताजी) अपने सगे-सम्बधियोंके घर भिजवाते तो, उनके स्नेहभरे तोहफे का  सालभर तारीफ करते नहीं थकते थे लोग ! हमारी अपनी आमराई होने के बावजूद हम बच्चे दूसरोंके बगीचे की कच्ची कैरियाँ रोज चुराकर लाते ! जब माँ को इस बात का पता चला तो माँ ने खूब डांट-फटकार लगाई !  कैरियोंको काटकर उसपर नमक- मिर्च लगाकर चटखारे ले-लेकर खाने का मजा, माँ के डांट-फटकार से कही जादा अच्छा लगा था तब !  जब से बाबा गए है आमराई का ध्यान रखने वाला कोई नहीं ! पिछली बार जब मै गाँव गई थी बस कुछ गिने चूने ही, आम के पेड़ बचे है !
ममा निचे चलो मच्छर सता रहे है ! अचानक बिटिया की आवाज से मै वर्तमान में आ गई ! काफी अँधेरा घिर आया था छतपर!

12 टिप्‍पणियां:

  1. @ "किन्तु इस उम्र में..."

    हाँ अधिक वृद्धावस्था में कैरी नहीं खाई जा सकती :-) मगर मैं अभी १५ -२० साल तक इसका आनंद ले सकता हूँ !
    शुभकामनायें आपको !

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  2. kachche aamo ke hare bhare guchchhe dekh man khil utha bahut sundar ,iski chatni pana bhi swadisht hote hai .

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  3. gaon kasbo me to ab bhi ye pratha chal rahi hai aur yahan ab bhi aisee cheezen aas pados me bati jati hain.aur ye bhi sahi hai jo aapki bitiya ne aapko roka kyonki ye jara see harkat bade babal bhi paida kar deti hai aajkal ke samay me.bahut achchhi lagi aapki post.vastvikta se judi.

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  4. बहुत सुंदर .....प्यारी होती हैं बचपन की यादें....

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  5. सार्थक रचना,,,
    आज गुड फ्राई डे के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं आपको !!

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  6. बचपन की याद दिला दी आपने।

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  7. Vartmaan aur guzre huve vaqt antar badhta ja raha hai ... par ateet mein jaana bahut hi madhur hota hai ...

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  8. ओह बहुत अच्छा संस्मरण. बचपन याद दिला दिया आपने. सुंदर प्रस्तुति.

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  9. अमिया चुरा कर खाने का अपना ही मज़ा है ....पर अब तो .........

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  10. बहुत अच्छा संस्मरण. बचपन याद दिला दिया आपने. सुंदर प्रस्तुति.

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