मंगलवार, 1 मई 2012

कैसी है पहचान तुम्हारी ......



सुख,
कहाँ हो तुम 
कैसी है पहचान 
तुम्हारी 
बहुत खोजने
पर भी नहीं
मिलते हो !
रोज तुम्हे ही 
खोजती हूँ 
यहाँ वहाँ घर के 
कोने-कोने में 
इंटरनेट  पर 
किस गाँव किस 
शहर किस गली में 
रहते हो 
अपना पता तो 
बतलाओ !
सुख तुम सच में   
महान हो
क्या इसीलिए 
प्रशंसा,पद,प्रतिष्ठा की 
ऊंची शाखों पर 
खिलते हो ?
कैसी है पहचान
तुम्हारी 
बहुत खोजने 
पर भी नहीं 
मिलते हो !

38 टिप्‍पणियां:

  1. जब सुख के क्षण आते हैं तो बस उनमे रम जाते हैं ... पहचान करना भूल जाते हैं ... बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  2. क्या इसीलिए
    प्रशंसा,पद,प्रतिष्ठा की
    ऊंची शाखों पर
    खिलते हो ?

    सुन्दर प्रस्तुति ।

    बधाईयाँ ।

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  3. महान हो
    क्या इसीलिए
    प्रशंसा,पद,प्रतिष्ठा की
    ऊंची शाखों पर
    खिलते हो ?

    बढ़िया प्रस्तुति,प्रभावित करती सुंदर रचना,.....बधाई सुमन जी ....

    MY RECENT POST.....काव्यान्जलि.....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

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  4. अपने ही भीतर तो है सुख.......
    बस मौका हमे देना है उसको बाहर निकलने का.....

    बहुत सुंदर भाव सुमन जी.
    सादर.

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  6. सुख तुम सच में
    महान हो
    क्या इसीलिए
    प्रशंसा,पद,प्रतिष्ठा की
    ऊंची शाखों पर
    खिलते हो ?

    ....सुख तो हमारे चारों ओर है, ज़रूरत है उसे पहचानने की....बेहतरीन प्रस्तुति...

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  7. पहचान मिल जाये तो हमें भी बताइयेगा :) ,बहुत सुंदर रचना आभार

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    1. सुनील जी,
      सुख की पहचान तो रचना में ही है :}
      आभार आने का .....

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  8. सुख को याद ही हम दुःख में करते हैं तो समझेंगें पह्चानेंगें कैसे ....सुंदर अभिव्यक्ति

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  9. नींद है उनकी उड़ी हुई जो
    बैठे ऊंची शाखों पर
    जीना सीखो प्रतिक्षण स्व में,
    जो तुम भी सुख चाहो गर!

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    1. सार्थक टिप्पणी की है आपने आभार ............ लेकिन आपसे एक प्यारी सी शिकायत है सर,
      आपने अपने ब्लॉग पर टिप्पणी करने की सुविधा बंद क्यों कर दी है ?
      जानती हूँ कोई खास कारण ही रहा होगा ! अगर मेरी दृष्टिकोण से देखे तो,
      टिप्पणियों को किसी राजनीती का हिस्सा ना बनाया जाए तो यह एक हमें आपस में
      जोड़ने का, सवस्थ संवाद कायम करने का अच्छा सेतु है !

      मुझको तो रंगों से मोह नहीं, फूलों से ...........

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    2. मैं उम्र में आपसे बहुत छोटा हूं। आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।
      टिप्पणी का कॉलम कुछ ऐसे ब्लॉगों को पढ़ने के प्रयोजन से बंद किया गया था जिन पर मैं अब तक नहीं गया ताकि उपलब्ध समय उसी पर लगाया जा सके। कई ब्लॉगों के सम्पर्क में आया भी हूं जिन पर कुछ अच्छी टिप्पणियां भी पढ़ने को मिली हैं।
      दुर्भाग्य से,हिंदी ब्लॉगिंग में माहौल इन दिनों ठीक नहीं है। टिप्पणी से इस कारण भी मन उचट जाता है। सोचता हूं,जहां तक हो सके,बगैर टिप्पणियों के ही ब्लॉगिंग का अभ्यास किया जाए।
      आपकी सहृदयता के प्रति कृतज्ञ हूं। लिखती रहें। टिप्पणी करूं न करूं,पर मैं आपको पढ़ रहा हूं,इतना सदैव स्मरण रहे।

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  10. बहुत सुंदर प्रस्तुति..... सुमन जी ....

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  12. दिल की परतों में सोये हो,
    लगते तो, कुछ अपने जैसे
    मन में इतने गए समाये
    तुम्हें छिपाए, बोलो कैसे ,
    जबसे तुमको मैंने देखा , पलकें अपनी बंद रखी हैं !
    कौन जान पायेगा तुमको, कैसी है पहचान तुम्हारी ?

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    1. सतीश जी,
      बहुत सुंदर पंक्तियाँ है इसे पूरा गीत बनाइये
      मुझे इस गीत का इंतजार रहेगा !
      आभार .......

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  13. बढ़िया प्रस्तुति,प्रभावित करती सुंदर रचना,.....बधाई जी ....

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  14. बहूत हि सुंदर रचना है...
    सुंदर प्रस्तुती.....

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  15. सुंदर रचना सुमन जी ....

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  16. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ...आभार ।

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  17. जहां 'कस्तूरी' बसती है

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

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  19. आपकी पोस्ट कल 19/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 861:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  20. sukh hota hai to ham use yaad hi nahi kar paate aur nahi hota to use khojte rahte --------aapki rachna dil ko chu gayi

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  21. हमेशा छिपा रहता है सुख -लगता है पीछे कहीं छूट गया है !

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  22. सुख के पीछे भागने पर वह फिसलता जाता है पर पीछा ना करो तो स्वयं ही आ जाता है । सुखी होना आसान है पर आसान होना ...............

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  23. सुख बंद जो है आज बड़े लोगों की तिजोरी मे ... अच्छी रचना है ...

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  24. यह तो मृगतृष्णा है। दिखती है, नहीं भी दिखती।

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  25. ये सब wese ही है जैसे अंदर की रोशनी बाहर के अंधेरे में ojhal हो जाती है
    बेहतरीन प्रस्तुति...

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  26. खुशी चलकर किसी के घर कभी यूँ ही नहीँ आई
    जिसने जोर अजमाया उसी के साथ भरमाई।

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