सोमवार, 19 जनवरी 2015

देश,धरती की दुर्गति ...

हम,
गति कहे या इसे
देश,धरती की दुर्गति
चार बच्चे पैदा करने की
सलाह को
संत,महंत,नेताओं की
जाहिल नीति .... !


समय के साथ
शब्द भी अपने अर्थ
खो देते है शायद,
'अष्ट पुत्र सौभाग्यवती'
तब आशीष समान
अब चार बच्चे भी
 लगती है गाली … !

8 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है आपने ... समय, काल और गति को देखना जरूरी है ... नारी मन की भावनाओं को भी देखना जरूरी है ... फिर सही पालन भी जरूरी है बच्चों का ...

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  2. Sirf sankhya badhana hee to uddesh nah I hai na? Ye ha mare pratindividuals hain jo aisi gair jimmedar baten karate hain.

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  3. सटीक .... वैचारिक धरातल पर बहुत कुछ गुम हो रहा है

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  4. भगिनी सुमन!! इस तरह की बातों पर एक कविता की रचना उस कविता को व्यर्थ करना और कविता की अवमानना है. कोई भी वक्तव्य स्वीकारने या नकारने के पूर्व उसके पीछे छिपी मंशा को टटोलना आवश्यक है ऐसा उस समय और भी अनिवार्य हो जाता है जब वह वक्तव्य एक राजनैतिक का हो, जिनकी कथनी और करनी में मेल नहीं होता. और यहाँ तो करेले पे नीम की तरह राजनैतिक ने संत का लिबास पहना हुआ है. ऐसे में इतनी सुन्दर कविता और भाव व्यर्थ होने से बचाओ!

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    1. कुशल कलाकार के
      हाथ में पड़कर
      फिर फिर गले
      फिर फिर पिघले
      सुघड़ सांचे में ढले
      प्रेरक बने प्रेरणा बने
      कविता के भाव मेरे
      व्यर्थ न हुए :)

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  5. यही समय दुरुस्त है
    निरक्षरों को लूट लें !
    विदेशियों से छीन के
    ये राज्यभक्त लूट लें !
    दाढ़ियों को मंत्रमुग्ध , मूर्ख तंत्र, सुन रहा !
    समग्र मूर्ख शक्ति को, विचारवान चाहिए !

    धर्मोन्मत्त देश में ,
    असभ्य एक चाहिए
    असाधुओं से न डरे
    अशिष्ट एक चाहिए
    सड़ी गली परम्परा में ,अग्निदान चाहिए !
    अपाहिजों के देश में, कोचवान चाहिये !

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  6. 'अष्ट पुत्र सौभाग्यवती'
    तब आशीष समान
    अब चार बच्चे भी
    लगती है गाली … !

    ........सही कहा है आपने


    Recent Post शब्दों की मुस्कराहट पर मेरी नजर से चला बिहारी ब्लॉगर बनने: )

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