शुक्रवार, 20 जून 2014

शब्दकोष से निकल कर …

उफ्
मेरे भीतर
भीड़ 
मेरे बाहर 
भीड़ 
भीड़ ही भीड़ 
ऐसे लग रहा है 
जैसे … 
विचार नहीं 
सड़क पर 
दौड़ रही है 
ट्रैफिक,
जरा शब्दकोष से 
निकल कर 
बाहर तो 
आ जाओ 
  शांति     … !!

9 टिप्‍पणियां:

  1. उम्मीद है यह शीघ्रातिशीघ्र हो :)

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  2. बहुत ही साधारण सी बात कहने का बहुत ही असाधारण अन्दाज़! बीमारी इंसान को फ़िलॉसफ़र बना देती है! :)
    सच कहा है, शब्दों के ट्रैफ़िक जाम में विचारों की गाड़ियों के पहिये रुक से गये हैं. देखें आगे क्या होता है, कब खुलता है यह जाम!!
    अपना ख़्याल रखें!!

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    1. सलिल भाई,
      आपकी टिप्पणी न साधारण रचना को भी असाधारण बना देती है
      एक रचनाकार की शायद यही तो मज़बूरी है जीवन,मृत्यु,ध्यान,प्रेम,शांति जैसी
      महत्वपूर्ण बाते भी कहने के लिए शब्दों का सहारा लेना पड़ता है हालाँकि शब्द सत्य नहीं केवल इंगित मात्र है ! अभिव्यक्ति के लिए केवल सहायक बनते है शब्द ! आपने सच कहा बिमारी मनुष्य को फिलॉसफर बना देती है लेकिन बीमारी फिलॉसफर नहीं साक्षी बना दे तभी बीमारी में भी आनंद है :)
      आभार टिप्पणी के लिए !

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  3. बहुत खूब ... शान्ति की आजकल बहुत डिमांड है ... शब्द कोष में भी ढूंढें नहीं मिल रही ...

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  4. विचारों को व्यक्त कर दें, बस !!
    मंगलकामनाएं !!

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