शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

अमरबेल ....... ( लघु कथा )


गुलमोहर के पेड़ पर फैली एक अमरबेल थी ! वह फैलते-फैलते, बढ़ते-बढ़ते गुलमोहर के निर्देशों को मानते थक गयी थी! उसका मन परतंत्रता से उब गया था वह अब स्वतन्त्र होना चाहती थी! अपने भोजन पानी के लिये गुलमोहर पर आश्रित  नहीं रहना चाहती थी ! निरंतर गुलमोहर की अवहेलना से तंग आ कर उसने एक दिन विद्रोह कर दिया ! और जोर-जोर से चिल्लाई ताकि, सारा अस्तित्व सुनले ! "मैं अब तुम पर आश्रित हो कर नहीं बढूंगी, कभी नहीं बढूंगी सुना तुमने ?" "मत बढ़ो ! बढ़ने की क्या आवश्यकता है ? ना बढ़ने के श्रम में एक दिन मर जाओगी !" गुलमोहर ने गुस्से से कहा ! कुटिल मुस्कुराहट चेहरे पर लिये अमर बेल बहुत खुश हुई , आखिर उसका विद्रोह सफल जो होने जा रहा था !

         अमर बेल गुलमोहर के पेड़ पर फैलती गयी फैलती गयी धीरे-धीरे गुलमोहर को अपने गिरफ्त में लेने लगी ! गुलमोहर को मिलने वाला सारा प्राकृतिक पोषण अमर बेल अब खुद ग्रहण करने लगी ! बेचारा गुलमोहर!! जिसकी मज़बूत जड़े धरती की आगोश में समायी हुई थी दिन-ब-दिन गुलमोहर दीन-हीन लगने लगा था !  उसकी मुरझाई हुयी टहनियों को देखकर ऐसे लगने लगा जैसे अमर बेल की असहनीय पकड़न से आपने आप को छुड़ाने की नाकाम कोशीश करने लगा है ! 

15 टिप्‍पणियां:

  1. उसकी मुरझाई हुयी टहनियों को देखकर ऐसे लगने लगा जैसे अमर बेल की असहनीय पकड़न से आपने आप को छुड़ाने की नाकाम कोशीश करने लगा है ! gahan abhivyakti.

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  2. कमाल है ....
    सोंचने को मजबूर करती रचना ....
    शायद हमारे जीवन में भी कहीं न कहीं अमरबेल हैं जो देखने में सुंदर लगती है !
    आभार !

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  3. गहन अभिव्यक्ति .. ऐसी अमरबेल अस्तित्व ही खत्म कर देती है ..

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  4. लोहडी और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं.....


    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  5. सुमन जी आपकी इस रचना में गुलमोहर और अमरलता जिसके लिए प्रयोग हुआ है, या कहें कि बिम्बात्मक अभिव्यक्ति हुई है ... वह निश्चित ही आपकी चिंता को दर्शाता है। इस भव्य रचना को अपनी ही कविता की कुछ पंक्तियां समर्पित करता हूं ...

    हे अमरलता !
    हे अमरबेल !

    दिखने में कोमल पर क्रूर,
    चूसे पादप को भरपूर,
    टहनी-टहनी, डाली-डाली,
    छिछल रही है तू मतवाली,
    री ! परजीवी
    खेल रही तू,
    शोषण का
    व्यापक यह खेल।
    हे अमरलता !
    हे अमरबेल !

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    1. मनोज जी आपकी इस रचना ने सुमन जी के लेख में चार चाँद लगा दिए,....

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  6. आदरणीय मनोज जी,
    आपकी कविता की पंक्तियों ने इस रचना को सार्थक कर दिया है !
    आभार आपका !

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  7. गंभीर और अर्थपूर्ण आलेख ..

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  8. बहुत सुंदर प्रस्तुति,सार्थक सटीक लेख, \
    new post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....

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  9. मै समर्थक बन गया हूँ आप भी बने तो मुझे दिली खुशी होगी,...

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  10. बहुत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत्त किया है. परजीवी एक दिन सम्पूर्ण नाश कर देता है मूल का.

    लघुकथा बहुत कुछ कह जाती है और सोचने पर मजबूर करती है. बधाई.

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  11. भ्रष्टाचार और जातिवाद की इस विषबेल से हमारी अर्थव्यवस्था और ईमानदारी का भी एक दिन यही हाल होगा।

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  12. आपका यह पोस्ट अच्छा लगा । । मेरे नए पोस्ट "हो जाते हैं क्यूं आद्र नयन" पर आपके प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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