रविवार, 20 नवंबर 2011

मॉर्निंग वॉक ...........


जैसे ही सर्द हवाएँ बहने लगी है सर्दी का मौसम आने का संकेत मिल गया ! इस सर्दी में हमें गरमी का अहसास दिलाने अलमारी में कबसे आराम फरमा रहे स्वेटर, शॉल, रजाई सब बाहर निकल कर आ गए है !
सर्दी के इस मौसम में सबको देर तक बिस्तर में दुबक के सोना बहुत अच्छा लगता है ! रोज सुबह जल्दी उठने वाले लोग भी कई बार आलार्म बंद करके फिर सो जाते होंगे है ना ? मेरे साथ भी कई बार ऐसा ही होता है !  सुबह पांच बजे बजने वाली आलार्म बंद कर के फिर सो जाने का मन करता है ! भले ही इन दिनों उठने का मन न करता हो पर अच्छे स्वास्थ्य के लिये उठना तो जरुरी है ! दिनभर के कितने सारे काम जो पड़े रहते है ! काम घर के हो चाहे ऑफिस के दिनभर उर्जावान बने रहना सबके लिये जरुरी है ! उर्जावान बने रहने के लिये हर कोई कुछ न कुछ शारीरिक श्रम करते ही होंगे जैसे की, व्यायाम, यौगिक क्रियाये, ध्यान प्राणायाम वगैरे! इन दिनों मॉर्निंग वॉक भी सेहत के लिये बहुत अच्छी होती है ! एक जैसी दिनचर्या से मन उब सा जाता है !
मुझे मौर्निंग वॉक के लिये osmaniya university के आजू-बाजू का जो सुंदर प्रदेश है वही सबसे उपयुक्त लगता है ! बड़े-बड़े वृक्ष, दूर-दूर तक फैली हरियाली, फूलों से लदे पेड़-पौधे बहुत ही रमणीय स्थान है ! सुबह-सुबह यहाँ पर टहलने बहुत सारे लोग आते है ! हमारे घर के बिलकुल पास में है !
जब भी घर से निकलती हूँ सबसे पहले एक अद्भुत नजारा देखने को मिलता है ! वह है हमारे पडोसी मिस्टर शर्मा जी के बाड़े में लगे हुये पेड़ों के सुंदर फ़ूल ! रास्ते से आने-जाने वालों का ध्यान अपनी ओर  आकर्षित कर लेते है ! अभी कुछ दिन पूर्व ही रिटायर्ड हुये वर्मा साहब जब इस रास्ते से टहलने निकलते है तो उनके हाथ में एक प्लास्टिक की थैली होती है ! और वे इन सुंदर फूलों को तोड़-तोड़ कर थैली में भर रहे होते है ! खुद को धार्मिक कहलाने वाले वर्मा जी को देखकर संकोच वश मै तो कुछ कह नहीं पाती ! पर मन में सोचती हूँ की भगवान के चरणों में  अगर फ़ूल चढ़ाना इतना ही जरुरी है तो, चढ़ा देते अपने दो रूपये के खरीदकर ! यह कैसा धर्मिक अपराध है ? क्या इससे भगवान खुश होंगे ? खैर ....इनके अलावा सुबह-सुबह दिखाई देते है अपने सायकल पर घर-घर जाकर पेपर पहुंचाते पेपरवाले, सड़क के बाजू में सुबह चार बजे से ही दूध के पैकेट बेचने बाले दूधवाले, बंडी पर चाय बनाता चायवाला ! सर्दी में गर्मागर्म चाय का मजा लेते लोग ! जैसे जैसे यूनिवर्सिटी का परिसर करीब आने लगता है सुगन्धित हवा नाकसे टकराकर रोम-रोम में नवस्फूर्ति का संचारण कर देती है ! कतारबद्ध वृक्षों को देखकर ऐसा लगता है जैसे अपनी साधना में लीन साधक बैठे है ! दूर-दूर तक हरियाली और उसपर पड़ी ओस की बुँदे मोतिसी चमकती है ! अपने-अपने घोसलों से निकलकर इस शाख से उस शाख पर फुदकते पंछी ! सारा वातावरण इनके मधुर कलरव से भर जाता है ! इन सब नजारों को देखते हुये टहलने का मजा ही कुछ ओर होता है ! तन और मन दोनों प्रसन्नतासे खिल उठते है ! शरीर फिरसे काम करने के लिये रिचार्ज हो जाता है ! सुबह का भ्रमण आपको तरोताजा और उर्जावान बना देता है ! बशर्ते की आपके हाथ में कुत्ता,कानों में इअर फोन और रास्ते पर चलते हुये अपने मित्रों से व्यर्थ की मुद्दों पर बहस बाजी न हो तभी ! प्रकृति हमसे अनेक-अनेक रूप धारण कर बात कर रही है ! लेकिन उसे सुनने के लिये एक संवेदनशील मन भी चाहिए !
जब वापसी में घर लौट रही होती हूँ तो दिखाई देते है वही फूल रहित पेड़ ! बिलकुल सूने-सूने बिना फूलों के ! पर निराश नहीं ! अब भी हरी भरी पत्तियाँ कलियाँ उन पेड़ों की शोभा बढ़ा रहे है, ताकि फिर कल खिलकर आते जाते मनुष्यों को थोड़ी ख़ुशी थोड़ी मुस्कुराहट बाँट सके ! प्रकृति कितना सब हमें देकर भी कितनी खुश है ! है ना ? और हम स्वार्थी मनुष्य उसे वापिस कुछ लौटाना तो दूर की बात उसका अनेक अनेक तरीकों से दोहन करते है ! प्रकृति हमें देकर जितनी खुश होती है उतने हम उससे लेकर भी कभी खुश नहीं होते ! कभी नहीं ...........

10 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति हमें देकर जितनी खुश होती है उतने हम उससे लेकर भी कभी खुश नहीं होते ! कभी नहीं ...

    बिलकुल सही लिखा है आपने .हमें जितना मिल रहा है वो भी तो खुश होने के लिए पर्याप्त होता है

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  2. सुबह का, सैर के साथ सजीव चित्रण, साथ ही बेहद आवश्यक संदेश।

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  3. प्रकृति के कण-कण में संदेश है। यह संदेश है परिवर्तन का,पुरातन का मोह छोड़ नए के स्वागत का,वर्तमान में रहते हुए प्रसन्नतापूर्वक जीने का,सर्वसमावेश का और अंतिम क्षण तक "देने" का। आदमी का जीवन इसके लगभग उलट है। न सीखना हमारा स्वभाव है और आत्मघात हमारी नियती।

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  4. सही कहा आपने हमें प्रकृति की चिता है ही नहीं सार्थक पोस्ट

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  5. जीवंत चित्रण ...... सच में सेहत के लिए दिन ऊर्जापूर्ण शुरुआत तो आवश्यक है....

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  6. सुबह जैसी आक्सीजन देती पोस्ट ...
    बधाई !

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  7. सही में मोर्निंग वोक को रोजमर्रा के जरूरी कामों में शामिल करना चाहिए!...यह स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है!..प्रेरक पोस्ट...धन्यवाद!

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  8. और वे इन सुंदर फूलों को तोड़-तोड़ कर थैली में भर रहे होते है ! खुद को धार्मिक कहलाने वाले वर्मा जी को देखकर संकोच वश मै तो कुछ कह नहीं पाती ! पर मन में सोचती हूँ की भगवान के चरणों में अगर फ़ूल चढ़ाना इतना ही जरुरी है तो, चढ़ा देते अपने दो रूपये के खरीदकर ! यह कैसा धर्मिक अपराध है ? क्या इससे भगवान खुश होंगे ?

    मैं आपसे सहमत हूँ...फूल भगवान् द्वारा ही तो बनाये गए हैं...उन्हें उन्हीं की बने रचना भेंट में देने का क्या औचित्य है? फूलों का दुरूपयोग बंद होना चाहिए...भगवान् को अगर खुश करना है तो अपने आचरण को सुधार कर करें...

    नीरज

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  9. सुंदर उपयोगी पोस्ट,स्वस्थ रहने के लिए मोर्निग वाक् जरूरी है,
    मेरें नए पोस्ट पर स्वागत है,

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  10. सुबह की सैर का सजीव चित्रण ..फ़ूल तोड़े न जाते तो बेहतर था ..

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