सोमवार, 19 सितंबर 2011

सवेरे सवेरे

सवेरे सवेरे
मीठे सपनों में
मै खोई हुई थी
इस कदर नींद कुछ
गहरा गई थी
क़ि झटके से टूट गई
ये किसने दी आवाज मुझको
सवेरे सवेरे !

उषा कबसे खड़ी
स्वर्ण कलश लिये
हाथ में
किसकी अगवानी में
हवायें मीठी तान सुनायें
पंछी गीत मधुर गायें
दूर-दूर तक राह में,
कौन बिछा गया
मखमली चादर हरी
सवेरे सवेरे !

कहो किसके स्वागत में
पलक-पावडे बिछाये
इस किनारे पेड़
उस किनारे पेड़
और बीच पथ पर
लाल पीली कलियाँ
किसने बिछाये है फूल
सवेरे सवेरे !

11 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. प्रकृति में ही मनुष्य का आह्लाद है।

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  3. सुमन जी इस अप्रतिम रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  4. 'किसने बिछाए फूल सबेरे सबेरे '
    |बहुत खूब लिखा है |बधाई |
    आशा

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  5. सुमन जी.. बहुत सुंदर लिखा है |बधाई |

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  6. सुमन जी नमस्कार्। सुन्दर भावों की प्रस्तुति आपकी रचना में ।

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  7. सुबह-सुबह तो प्रकृति ही हमारे स्वागत में रश्मि-हार लेकर खड़ी हो जाती है, हम ही हैं कि उसका भरपूर उपयोग नहीं करते।

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  8. प्रभात का मंज़र उतार दिया आँखों के सामने ... बहुत लाजवाब ...

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