शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

प्रीति-बंध

किसी की प्रशंसा में
फूल खिलते नहीं है
पंछी गीत गाते नहीं
तितलियाँ पंख अपने
रंगती नहीं है !
किसी की समीक्षा
के लिये नदी
रूकती नहीं है !
पहाड़ों, जंगलों को
काटती रंभाती नदी
अनवरत बहती
चली जाती है
सागर है  उसका
एक लक्ष !
हवा रूकती नहीं
नदी रूकती नहीं
तो फिर, तुम
किसकी प्रतीक्षा में
रुके हुये हो
ओ मेरे मन
तुम भी चल दो
तोड़कर प्रीति-बंध !

6 टिप्‍पणियां:

  1. सही है ....जिंदगी भी तो चलती ही जाती है

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  2. लेकिन प्यार की यात्रा चलती रहने चाहिए

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  3. ओ मेरे मन
    तुम भी चल दो
    तोड़कर प्रीति-बंध !


    गहन .... मन की गति सच में कई बन्धनों में जकड़ी होती है

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  4. कुछ तय नहीं कर पा रहा हूं क्या कहूं।

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  5. ्सुमन जी नमस्कार भावपूर्ण प्रस्तुति। जयहिन्द्।

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