बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

अहंकार अमरबेल है !

किसी भी वृक्ष पर
फैली हुई अमरबेल
धीरे-धीरे उस वृक्ष का
सारा रस चूसकर
उसके जीवन को ही
लील लेती है !
दूर-दूर तक फैला
मैं मैं करनेवाला
हमारा अहंकार
अमरबेल ही तो है
जिसमें कोई जड़
नहीं दिखती !
उपरसे हरा भरा
भीतरसे रुखा सूखा
जीवन दिखता है
पर !

5 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ फरवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. बहुत अच्छी और सच्ची बात ,सुंदर रचना... ,सादर स्नेह

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  3. वाह बहुत गहरा चिंतन..
    अंलकार और अमर बेल गहन दृष्टि ।

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  4. बहुत-बहुत सुंदर । गहरी बात कही है आपने। कम शब्दों में सागर पिरोया है। शुभकामनाएं आदरणीय सुमन जी।

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  5. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 136वां बलिदान दिवस - वासुदेव बलवन्त फड़के और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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