बुधवार, 19 अगस्त 2015

"मास्टर पीस"

दुनिया से  बेखबर
समाज में व्याप्त
उपेक्षित,निंदित,
भूखी,नंगी गरीबी
किसी छायाकार की
चित्र प्रदर्शनी में
प्रशंसकों के बीच
मास्टर पीस
कहलाती है … !

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (21.08.2015) को "बेटियां होती हैं अनमोल"(चर्चा अंक-2074) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. सच कहा है .... और वो मास्टरपीस चित्रकार की गरीबी ही मिटा पाता है उस गरीब की नहीं ...

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  3. सच कहा, यहाँ किसी की बेबसी का तमाशा ख़ूब होता है.

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  4. यही हकीकत है हमारे समाज की , जिसमें गरीब को कोई स्थान नहीं !

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  5. हाँ....आखिर रोज़गार है पहले...शेष संवेदनाएं बाद की बात है. यही एक स्वीकृत सूत्र बन चुका है.

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  6. आपकी इस कविता से सत्यजीत रे की फिल्म पथेर पांचाली याद आ गई। ऱे साहब को तो बडा नाम मिला जो उनकी मेहनत का था, पर ऐसी कितनी पांचालियां आज भी पथ मेंदरदर की ठोकरे खा रहीं हैं।

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  7. आपकी इस कविता से सत्यजीत रे की फिल्म पथेर पांचाली याद आ गई। ऱे साहब को तो बडा नाम मिला जो उनकी मेहनत का था, पर ऐसी कितनी पांचालियां आज भी पथ मेंदरदर की ठोकरे खा रहीं हैं।

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