रविवार, 8 मार्च 2015

"महिला दिवस" की सार्थकता ... !

नारी एक अभिव्यक्ति है
और अभिव्यक्ति जब
घर की चार दिवारी से निकल कर
आकाश की ऊंचाई छूने लगती है
तो सुनीता विलियम्स बन जाती है !
जब भीतर की गहराई छूने लगती है
तो सहजो,दया,मीरा, बन जाती है !
हर सीमा रेखा से परे धरती पर
सारी सभ्यता संस्कृति,
तब न पुरुष प्रधान होगी
न नारी प्रधान
केवल हार्दिक कहलायेगी !
सही मायने में तभी "महिला दिवस" की
सार्थकता होगी ... !

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति..
    सार्थक ...
    :-)

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  2. सहमत हूम आपकी बात से ... मुझे तो लगता है वही समाज, देश उन्नति कर पाता है जहां महिलाओं का सामान और आदर होता है ... बराबरी का व्यवहार होता है ... भारत देश के पतन का एक कारण समाज में महिलाओं की भागीदारी का न होना भी रहा है ....

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  3. सशक्त अभिव्यक्ति , सही कहा आपने

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  4. बहुत ही सुन्दर बात कही है भगिनी सुमन... आदि काल से चले आ रहे मानवता के दो धर्म ही तो हैं नारी और पुरुष... कोई प्रधान नहीं, कोई श्रेष्ठ नहीं... एक दूसरे के पूरक.
    सुनीता विलियम्स ही क्यों या फिर सहजो, मीरा ही क्यों, या मंगेशकर बहनें ही क्यों...! मैं तो उसे भी सलाम करता हूँ जिसे इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ते देखा था निराला ने. हमने उसके नाम के आगे बेचारी लगाकर उसे लाचार बना दिया.
    नतमस्तक हूँ मैं उसके सम्मुख क्योंकि अगर वो न होती तो मेरा अस्तित्व ही न होता!!

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    1. @ बहुत ही सुन्दर बात कही है भगिनी सुमन... आदि काल से चले आ रहे मानवता के दो धर्म ही तो हैं नारी और पुरुष... कोई प्रधान नहीं, कोई श्रेष्ठ नहीं... एक दूसरे के पूरक.
      याने की एक दिमाग दूसरा दिल, सहमत हूँ आपकी इस बात से दोनों की अपनी अपनी विशेषता है न कोई कम है न कोई ज्यादा !

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  5. @ सुनीता विलियम्स ही क्यों या फिर सहजो, मीरा ही क्यों, या मंगेशकर बहनें ही क्यों ?
    सुनीता विलियम्स एक वैज्ञानिक सोच है, सहजो मीरा एक आध्यात्मिक सोच है, एक दिमाग तो दूसरा ह्रदय (दिल) !

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  6. @ मैं तो उसे भी सलाम करता हूँ जिसे इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ते देखा था निराला ने. हमने उसके नाम के आगे बेचारी लगाकर उसे लाचार बना दिया.!

    घर से लेकर बाहर के हर क्षेत्र में उसकी अभूतपूर्ण भागीदारी के आगे मै भी नतमस्तक हूँ !
    निराला जैसे महान कवियों की उन तमाम महिलाओं की तरफ से मै आभारी हूँ जिन्होंने महिलाओं का अपने काव्य में सम्मान दिया लेकिन काव्यगत कल्पना या सम्मान एक तरफ हटाकर देखे तो उन महिलाओं को समाज में उचित समादर नहीं दिया गया इसके लिए उसे अभी भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है ! काश की उसे बिना लड़े बिना संघर्ष के उसके अधिकार मिलते तो और भी सुन्दर होता ! कवियों को महिलाओं के सिर्फ सम्मान के बारे में ही नहीं इससे अधिक सोचना करना होगा !

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  7. @ नतमस्तक हूँ मैं उसके सम्मुख क्योंकि अगर वो न होती तो मेरा अस्तित्व ही न होता!!
    आभार इस लाईन के लिए काश की ऐसा हर इंसान सोचता !
    एक वैज्ञानिक सोच है दूसरी आध्यात्मिक सोच यदि दोनों अपना अपना विकास समान मात्रा में करती है तो एक ऐसी संस्कृति का निर्माण होता जो सबके हित में हार्दिक होता तभी महिला दिवस की सार्थकता भी ! यह एक सपना है मेरा जो शायद ही कभी साकार हो ! बहुत बहुत आभार आपकी इस प्यारभरी टिप्पणी के लिए, कविता को विस्तार देना बड़ा मुश्किल काम है शायद मै सफल हुई भी या नहीं :) !

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  8. बहुत बहुत सुंदर रचना प्रस्‍तुत की है आपने। इस लिंक पर मेरी नई पोस्‍ट मौजूद है।

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  9. सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति...

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  10. बढ़िया है , मंगलकामनाएं आपको !

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  11. बहुत ही सुन्दर बात कही है सहमत हू

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