सोमवार, 19 जनवरी 2015

देश,धरती की दुर्गति ...

हम,
गति कहे या इसे
देश,धरती की दुर्गति
चार बच्चे पैदा करने की
सलाह को
संत,महंत,नेताओं की
जाहिल नीति .... !


समय के साथ
शब्द भी अपने अर्थ
खो देते है शायद,
'अष्ट पुत्र सौभाग्यवती'
तब आशीष समान
अब चार बच्चे भी
 लगती है गाली … !

बुधवार, 7 जनवरी 2015

सुबह-सुबह स्वर्ग के दरवाजे पर दस्तक हुयी ...

ठक-ठक ठक-ठक सुबह-सुबह स्वर्ग के दरवाजे पर दस्तक हुयी ! कौन है ? भीतर से देवदूत की आवाज आयी ! कृपया दरवाजा खोलिए बाहर खड़े व्यक्ति ने कहा ! देवदूत ने जरा सी खिड़की खोली और पूछा कौन हो और क्या चाहते हो ?? मै भीतर आना चाहता हूँ बाहर खड़े व्यक्ति ने कहा ! यह बताओ की शादीशुदा हो या गैर शादीशुदा हो देवदूत ने प्रश्न किया ! जी, शादीशुदा हूँ उस व्यक्ति ने विनम्रता से कहा ! ठीक है नरक तो तुमने धरती पर ही देख लिया अब स्वर्ग में आ जाओ स्वागत है कहते हुए देवदूत ने दरवाजा खोल दिया ! अभी दरवाजा बंद किया ही था की फिर से दस्तक हुई ठक-ठक !
देवदूत ने फिर से जरा सी खिड़की खोली और खिड़की से झांक कर अपना प्रश्न दोहराया कौन हो और क्या चाहते हो ?? बाहर खड़े उस व्यक्ति ने कहा जो अभी-अभी भीतर गया है मै उसीका मित्र हूँ हम दोनों साथ-साथ मरे थे लेकिन उसकी चाल हमेशा मेरी चाल से थोड़ी अधिक तेज थी इसलिए वह जरा तेजी से यहाँ आ गया सो, दरवाजा खोलिए ! देवदूत ने पहले वाले व्यक्ति से किया गया प्रश्न दोहराया शादीशुदा हो या गैर शादीशुदा ?? बाहर खड़े व्यक्ति ने कहा एक नहीं तीन बार की है चौथी के चक्कर में बुरा फंस गया कुछ पछतावे भरे स्वर में उसने कहा … !!
पहली शादी एक ही भूल समझ कर माफ़ करने लायक है दूसरी बार शादी अनुभव अभी कच्चा है पका नहीं समझ कर फिर भी माफ़ी लायक है लेकिन बार-बार की गयी गलती की यहाँ माफ़ी नहीं हो सकती ! यह स्वर्ग है कोई धरती का पागलखाना समझा है देवदूत ने खिड़की  बंद करते हुए कहा … !!